Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/89/1

118 Sukta
4 Mantra
7/89/1
Devata- अग्निः Rishi- सिन्धुद्वीपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दिव्यआपः सूक्त
Mantra with Swara
अ॒पो दि॒व्या अ॑चायिषं॒ रसे॑न॒ सम॑पृक्ष्महि। पय॑स्वानग्न॒ आग॑मं॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा ॥

अ॒प:। दि॒व्या: । अ॒चा॒यि॒ष॒म् । रसे॑न । सम् । अ॒पृ॒क्ष्म॒हि॒ । पय॑स्वान् । अ॒ग्ने॒ । आ । अ॒ग॒म॒म् । तम् । मा॒ । सम् । सृ॒ज॒ । वर्च॑सा ॥९४.१॥

Mantra without Swara
अपो दिव्या अचायिषं रसेन समपृक्ष्महि। पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा ॥

अप:। दिव्या: । अचायिषम् । रसेन । सम् । अपृक्ष्महि । पयस्वान् । अग्ने । आ । अगमम् । तम् । मा । सम् । सृज । वर्चसा ॥९४.१॥

Meaning
१.(दिव्याः अपः) = [दिवि भवा:] अन्तरिक्ष के मेष से प्राप्त होनेवाले जलों को (अचायिषम्) = मैंने पूजित किया है। इन्हें स्नानादि के लिए मैंने स्तुत किया है। (रसेन समक्ष्महि) = हम इन जलों के रस से संगत हुए हैं। २. इन दिव्य जलों के प्रयोग के साथ (अग्रे) = हे प्रभो! (पयस्वान्) = प्रशस्त दूधवाला मैं (आगमम्) = आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ। (तं मा) = उस मुझे (वर्चसा संसृज) = वर्चस से-प्राणशक्ति से संसृष्ट कीजिए।
Essence
आकाश से प्राप्त होनेवाले मेघजल तथा प्रशस्त गोदुग्ध का सेवन हमें वर्चस्वी बनाता है।
Subject
मेघजल तथा गोदुग्ध के सेवन से 'वर्चस्' की प्राप्ति

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.