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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/82/2

118 Sukta
6 Mantra
7/82/2
Devata- अग्निः Rishi- शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अग्नि सूक्त
Mantra with Swara
मय्यग्रे॑ अ॒ग्निं गृ॑ह्णामि स॒ह क्ष॒त्रेण॒ वर्च॑सा॒ बले॑न। मयि॑ प्र॒जां मय्यायु॑र्दधामि॒ स्वाहा॒ मय्य॒ग्निम् ॥

मयि॑ । अग्रे॑ । अ॒ग्निम् । गृ॒ह्णा॒मि॒ । स॒ह । क्ष॒त्रेण॑ । वर्च॑सा । बले॑न । मयि॑ । प्र॒ऽजाम् । मयि॑ । आयु॑: । द॒धा॒मि॒ । स्वाहा॑ । मयि॑ । अ॒ग्निम् ॥८७.२॥

Mantra without Swara
मय्यग्रे अग्निं गृह्णामि सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन। मयि प्रजां मय्यायुर्दधामि स्वाहा मय्यग्निम् ॥

मयि । अग्रे । अग्निम् । गृह्णामि । सह । क्षत्रेण । वर्चसा । बलेन । मयि । प्रऽजाम् । मयि । आयु: । दधामि । स्वाहा । मयि । अग्निम् ॥८७.२॥

Meaning
१. (अग्रे) = सर्वप्रथम मैं (मयि) = अपने में (अग्निं गृह्णामि) = उस अग्रणी प्रभु को धारण करता हूँ, (परिणामतः क्षत्रेण वर्चसा बलेन सह) = क्षतों से त्राण करनेवाले बल से, प्राणशक्ति से [वर्चसा] तथा मनोबल से युक्त होता हूँ। प्रभु का धारण 'क्षत्र, वर्चस् व बल' देता है। २. (मयि प्रजा दधामि) = मैं इस प्रभु-पूजन से उत्तम सन्तान को धारण करता हूँ। (मयि आयु:) = अपने में आयुष्य को धारण करता हूँ। (स्वाहा) = [सुआह]-सबसे उत्तम यह कथन है कि मयि अग्रिम-अपने में अग्नि को धारण करता हूँ। अग्नि के धारण से इन सबका धारण हो ही जाता है।
Essence
अपने अन्दर प्रभु को धारण करने से हम 'क्षत्र, वर्चस्, बल, प्रजा व आयु' को धारण कर रहे होते हैं।
Subject
'क्षत्र, वर्चस्, बल, प्रजा, आयु' का धारण

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