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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/70/1

118 Sukta
5 Mantra
7/70/1
Devata- श्येनः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुदमन सूक्त
Mantra with Swara
यत्किं चा॒सौ मन॑सा॒ यच्च॑ वा॒चा य॒ज्ञैर्जु॒होति॑ ह॒विषा॒ यजु॑षा। तन्मृ॒त्युना॒ निरृ॑तिः संविदा॒ना पु॒रा स॒त्यादाहु॑तिं हन्त्वस्य ॥

यत् । किम् । च॒ । अ॒सौ । मन॑सा । यत् । च॒ । वा॒चा । रा॒ज्ञै: । जु॒होति॑ । ह॒विषा॑ । यजु॑षा । तत् । मृ॒त्युना॑ । नि:ऽऋ॑ति: । स॒म्ऽवि॒दा॒ना । पु॒रा । स॒त्यात् । आऽहु॑तिम् । ह॒न्तु॒ । अ॒स्य॒ ॥७३.१॥

Mantra without Swara
यत्किं चासौ मनसा यच्च वाचा यज्ञैर्जुहोति हविषा यजुषा। तन्मृत्युना निरृतिः संविदाना पुरा सत्यादाहुतिं हन्त्वस्य ॥

यत् । किम् । च । असौ । मनसा । यत् । च । वाचा । राज्ञै: । जुहोति । हविषा । यजुषा । तत् । मृत्युना । नि:ऽऋति: । सम्ऽविदाना । पुरा । सत्यात् । आऽहुतिम् । हन्तु । अस्य ॥७३.१॥

Meaning
१. (असौ) = वह दूरस्थ शत्रु (यत् किम्) = जो कुछ कर्म-शत्रुहननरूप कर्म करने के लिए (मनसा) = मन के द्वारा ध्यान करता है, (यत् च) = और जो कर्म (वाचा) = वाणी से 'करता हूँ' इसप्रकार कहता है तथा (यज्ञैः) = अभिचार कर्मों से, (हविषा) = उस कर्म के लिए उचित द्रव्यों से, (यजुषा) = मन्त्रों से (जुहोति) = होम करता है, (अस्य) = अपने प्रतिपक्ष के विनाश के लिए 'मन, वाणी व शरीर' से उपाय करते हुए शत्रु के (तत्) = उस मन से, ध्यान व वाणी से उक्त कर्म को तथा (आहुतिम्) = क्रिया से निष्पाद्यमान होमकर्म को (सत्यात् पुरा) = सत्यभूत कर्मफल से पहले ही, कर्म के सफल होने से पूर्व ही (निर्ऋति:) = पाप देवता (मृत्युना संविदाना) = मृत्यु के साथ संज्ञान-[ऐकमत्य]-बाली हुई-हुई (हन्तु) = नष्ट कर डाले।
Essence
शत्रु द्वारा मन, वाणी व कर्म' से हमारे विषय में क्रियमाण अभिचार कर्म के फलप्रद होने से पूर्व ही मृत्युसहित पापदेवता उस शत्रु को नष्ट कर डाले। पापकर्म करनेवाला उस कर्म से स्वयं ही विनष्ट हो जाए।

 
Subject
हिंस्त्रः स्वपापेन विहिंसितः खलु

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