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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/5/2

118 Sukta
5 Mantra
7/5/2
Devata- आत्मा Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
य॒ज्ञो ब॑भूव॒ स आ ब॑भूव॒ स प्र ज॑ज्ञे॒ स उ॑ वावृधे॒ पुनः॑। स दे॒वाना॒मधि॑पतिर्बभूव॒ सो अ॒स्मासु॒ द्रवि॑ण॒मा द॑धातु ॥

य॒ज्ञ: । ब॒भू॒व॒ । स: । आ । ब॒भू॒व॒ । स: । प्र । ज॒ज्ञे॒ । स: । ऊं॒ इति॑ । व॒वृ॒धे॒ । पुन॑: ।स: । दे॒वाना॑म् । अधि॑ऽपति: । ब॒भू॒व॒ । स: । अ॒स्मासु॑ । द्रवि॑णम् । आ । द॒धा॒तु॒ ॥५.२॥

Mantra without Swara
यज्ञो बभूव स आ बभूव स प्र जज्ञे स उ वावृधे पुनः। स देवानामधिपतिर्बभूव सो अस्मासु द्रविणमा दधातु ॥

यज्ञ: । बभूव । स: । आ । बभूव । स: । प्र । जज्ञे । स: । ऊं इति । ववृधे । पुन: ।स: । देवानाम् । अधिऽपति: । बभूव । स: । अस्मासु । द्रविणम् । आ । दधातु ॥५.२॥

Meaning
१. यज्ञो (बभूव) = वह पूजनीय प्रभु सदा से है, (स आ बभूव) = वह सर्वत्र-चारों ओर विद्यमान है, (सः प्रजज्ञे) = वह इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रादुर्भूत करता है, (स: उ वावृधे पुन:) = फिर वही इस ब्रह्माण्ड का वर्धन करता है। २. (स:) = वे प्रभु ही (देवानाम् अधिपतिः बभूव) = सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि आदि सब देवों के अधिपति हैं। (सः) = वे प्रभु ही (अस्मासु) = हममें (द्रविणम्) = आदधातु धन का धारण करें। प्रभु यज्ञ हैं-देनेवाले हैं। वे हमें जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन दें।
Essence
वे यज्ञरूप प्रभु सदा से हैं-सर्वत्र हैं। वे इस संसार को प्रादर्भत करते हैं, प्रलयानन्तर फिर इसका वर्धन करते हैं। वे सब देवों के स्वामी है, हमारे लिए भी आवश्यक धन देते हैं।
Subject
यज्ञः बभूव, स आबभूव

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