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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/32/1

142 Sukta
3 Mantra
6/32/1
Devata- अग्निः Rishi- चातन Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यातुधानक्षयण सूक्त
Mantra with Swara
अ॑न्तर्दा॒वे जु॑हु॒ता स्वे॒तद्या॑तुधान॒क्षय॑णं घृ॒तेन॑। आ॒राद्रक्षां॑सि॒ प्रति॑ दह॒ त्वम॑ग्ने॒ न नो॑ गृ॒हाणा॒मुप॑ तीतपासि ॥

अ॒न्त॒:ऽदा॒वे । जु॒हु॒त॒ । सु । ए॒तत् । या॒तु॒धा॒न॒ऽक्षय॑णम् । घृ॒तेन॑ । आ॒रात् । रक्षां॑सि । प्रति॑ । द॒ह॒ । त्वम् । अ॒ग्ने॒ । न । न॒: । गृ॒हाणा॑म् । उप॑ । ती॒त॒पा॒सि॒ ॒॥३२.१॥

Mantra without Swara
अन्तर्दावे जुहुता स्वेतद्यातुधानक्षयणं घृतेन। आराद्रक्षांसि प्रति दह त्वमग्ने न नो गृहाणामुप तीतपासि ॥

अन्त:ऽदावे । जुहुत । सु । एतत् । यातुधानऽक्षयणम् । घृतेन । आरात् । रक्षांसि । प्रति । दह । त्वम् । अग्ने । न । न: । गृहाणाम् । उप । तीतपासि ॥३२.१॥

Meaning
१. (अन्तः दावे) = अग्नि में (एतत्) = इस (यातुधानाक्षयणम्) = पीड़ाकर रोग-कृमियों को नष्ट करनेवाली हवि को (घृतेन) = घृत के साथ (सुजहत) = सम्यक् आहुत करो। २. हे (अग्ने) = यज्ञाग्ने। (त्वम्) = तू (रक्षांसि) = रोगकृमियों को (आरात् प्रतिदह) = सुदूर दग्ध कर दे और इसप्रकार (न: गृहाणाम्) = हमारे घरों का (न उपतीतपासि)-= सन्तापक नहीं होता है। अग्नि रोगकृमियों के विनाश के द्वारा हमारे घरों को स्वस्थ वातावरणवाला बनाता है।
Essence
हम अग्नि में घृत के साथ कृमिनाशक हविर्द्रव्यों को आहत करें। यह अग्नि रोगकृमियों के विनाश के द्वारा हमें सुखी करेगा।
Subject
अग्निहोत्र द्वारा रक्षोदहन

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