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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/131/2

142 Sukta
3 Mantra
6/131/2
Devata- स्मरः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- स्मर सूक्त
Mantra with Swara
अनु॑मतेऽन्वि॒दं म॑न्य॒स्वाकू॑ते॒ समि॒दं नमः॑। देवाः॒ प्र हि॑णुत स्म॒रम॒सौ मामनु॑ शोचतु ॥

अनु॑ऽमते । अनु॑ । इ॒दम् । म॒न्य॒स्व॒ । आऽकू॑ते । सम् । इ॒दम् । नम॑: । देवा॑: । प्र । हि॒णु॒त॒ । स्म॒रम् । अ॒सौ । माम् । अनु॑ । शो॒च॒तु॒ ॥१३१.२॥

Mantra without Swara
अनुमतेऽन्विदं मन्यस्वाकूते समिदं नमः। देवाः प्र हिणुत स्मरमसौ मामनु शोचतु ॥

अनुऽमते । अनु । इदम् । मन्यस्व । आऽकूते । सम् । इदम् । नम: । देवा: । प्र । हिणुत । स्मरम् । असौ । माम् । अनु । शोचतु ॥१३१.२॥

Meaning
१. काम से पीड़ित मनुष्य सिर से पैर तक एक विचित्र-सी व्यथा को अनुभव करता है। वह व्यथा ही यहाँ 'आधि' शब्द से कही गई है। 'काम' के विनाश के लिए कटिबद्ध व्यक्ति 'काम' को ही सम्बोधित करके कहता है कि हे काम!( नि शीर्षतः नि पत्तत:) = सिर से लेकर पाँव तक (ते आध्यः) = तेरे कारण उत्पन्न इन मानस पीड़ाओं को (नितिरामि) = विनष्ट [destroy] व पराभूत करता हूँ। २. हे (देवा:) = देवो! (स्मरं प्रहिणुत) = इस काम को मुझसे दूर भेजो, (असौ माम् अनुशोचतु) = यह काम मेरा शोक करे। मैं 'काम' के कारण शोकातुर न होऊँ। काम ही निर्वासित होकर, स्थान छिन जाने से मेरा शोक करे कि 'किस प्रकार उसके हृदय में रहता था और अब निकाल दिया गया हूँ। ३. हे (अनुमते) = शास्त्रानुकूल कार्यों को करने की बुद्ध! तू (इदम् अनुमन्यस्व) = इस 'काम-निर्वासन'- रूप मेरी अभिलाषा को अनुज्ञात कर। हे (आकूते) = दृढ़ संकल्प! तेरे लिए (इदं नमः सम्) [प्रापयामि] = इस नमस्कार व आदरभाव को प्राप्त कराता हैं। तू भी इस कामनिर्वासन का अनुज्ञान कर-मुझे कामनिर्वासन के योग्य बना।
Essence
हम कामवासना को दूर करके कामजनित पीड़ाओं को विनष्ट करें। इस कार्य में शास्त्रानुकूल कार्य करने की बुद्धि तथा दृढ़ संकल्प हमारे सहायक हों। 'देव भी इस 'काम' को हमसे दूर भेजें'-इसका भाव यह है कि हम सूर्य-चन्द्र, वायु आदि देवों के सम्पर्क में जितना अधिक अपने जीवन को बिताएँगे, अर्थात् जीवन जितना स्वाभाविक होगा, उतना ही हम वासना को जीत पाएँगे। कृत्रिम, विलासमय जीवन वासना को जाग्रत् करने में सहायक होता है।
Subject
सिर से पैर तक कामजनित पीड़ा

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