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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 5/21/10

31 Sukta
12 Mantra
5/21/10
Devata- वानस्पत्यो दुन्दुभिः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुसेनात्रासन सूक्त
Mantra with Swara
आदि॑त्य॒ चक्षु॒रा द॑त्स्व॒ मरी॑च॒योऽनु॑ धावत। प॑त्स॒ङ्गिनी॒रा स॑जन्तु॒ विग॑ते बाहुवी॒र्ये॑ ॥

आदि॑त्य । चक्षु॑: । आ । द॒त्स्व॒ । मरी॑चय: । अनु॑ । धा॒व॒त॒ । प॒त्ऽस॒ङ्गिनी॑: । आ । स॒ज॒न्तु॒ । विऽग॑ते । बा॒हु॒ऽवी॒र्ये᳡ ॥२१.१०॥

Mantra without Swara
आदित्य चक्षुरा दत्स्व मरीचयोऽनु धावत। पत्सङ्गिनीरा सजन्तु विगते बाहुवीर्ये ॥

आदित्य । चक्षु: । आ । दत्स्व । मरीचय: । अनु । धावत । पत्ऽसङ्गिनी: । आ । सजन्तु । विऽगते । बाहुऽवीर्ये ॥२१.१०॥

Meaning
१. हे (आदित्य) = सूर्य! (चक्षुः आदत्स्व) = तू शत्रु को आँखों को छीन ले, उन्हें चुंधिया दे। (मरीचयः अनुधावत) = हे किरणो! तुम शत्रुओं का पीछा करो। 'आदित्य' सेनापति है-शत्रुओं के बल का आदान करनेवाला। 'मरीचयः' सैनिक हैं [नियते शत्रुतमः अस्मिन्] जिसके होने पर शत्रुओं का अन्धकार समास हो जाता है। २. (विगते बाहुवीर्ये) = जब शत्रुओं का बाहुबल टूट जाए तब (पत्संगिनी: आसजन्तु) = पैरों में पड़नेवाली रस्सियाँ शत्रुओं के पैरों मंं लग जाएँ।
Essence
सेना के साथ सेनापति शत्रु का पीछे करे, शत्रु को थकाकर उन्हें बेड़ियाँ पहनाकर कारागृह में डाल दे।
Subject
आदित्य-मरीचयः

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