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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 5/2/7

31 Sukta
9 Mantra
5/2/7
Devata- वरुणः Rishi- बृहद्दिवोऽथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- भुवनज्येष्ठ सूक्त
Mantra with Swara
स्तु॒ष्व व॑र्ष्मन्पुरु॒वर्त्मा॑नं॒ समृभ्वा॑णमि॒नत॑ममा॒प्तमा॒प्त्याना॑म्। आ द॑र्शति॒ शव॑सा॒ भूर्यो॑जाः॒ प्र स॑क्षति प्रति॒मानं॑ पृथि॒व्याः ॥

स्तु॒ष्व । व॒र्ष्म॒न् । पु॒रु॒ऽवर्त्मा॑नम् । सम् । ऋभ्वा॑णम् । इ॒नऽत॑मम् । आ॒प्तम् । आ॒प्त्याना॑म् ।आ । द॒र्श॒ति॒ । शव॑सा । भूरि॑ऽओजा: । प्र । स॒क्ष॒ति॒ । प्र॒ति॒ऽमान॑म् । पृ॒थि॒व्या: ॥२.७॥

Mantra without Swara
स्तुष्व वर्ष्मन्पुरुवर्त्मानं समृभ्वाणमिनतममाप्तमाप्त्यानाम्। आ दर्शति शवसा भूर्योजाः प्र सक्षति प्रतिमानं पृथिव्याः ॥

स्तुष्व । वर्ष्मन् । पुरुऽवर्त्मानम् । सम् । ऋभ्वाणम् । इनऽतमम् । आप्तम् । आप्त्यानाम् ।आ । दर्शति । शवसा । भूरिऽओजा: । प्र । सक्षति । प्रतिऽमानम् । पृथिव्या: ॥२.७॥

Meaning
१. हे जीव! तू (वर्ष्मन्) = [शरीरं वर्मविग्रहः] इस मानव-शरीर में उस प्रभु का (स्तुष्व) = स्तवन कर जो प्रभु (पुरुवर्त्मानिम्) = पालक व पूरक मार्गवाले हैं। प्रभु-प्राप्ति का मार्ग हमें नीरोगता व निर्मलता की ओर ले-चलता है। वे प्रभु (समृभ्वाणम्) = ज्ञान से सम्यग् दीप्त हैं, (इनतमम्) = सर्वमहान् स्वामी हैं, (आप्त्यानाम् आप्तम्) = विश्वसनीयों में विश्वसनीय हैं। प्रभु-भक्त को किसी प्रकार का संशय नहीं रहता। प्रभु उपासकों का रक्षण करते ही हैं। वे (भूर्योजा:) = अनन्त बलवाले प्रभु (शवसा) = बल के द्वारा (आदर्शति) = समन्तात् दृष्टिगोचर होते हैं-सर्वत्र प्रभु की शक्ति कार्य करती हुई प्रतीत होती है। वे प्रभु (पृथिव्याः) = पृथिवी के (प्रतिमानम्) = प्रतिमान को-समानता को (प्रसक्षति) = धारण करते हैं, अर्थात् इस पृथिवी की भाँति सबके आधार होते हुए सबका पालन व पोषण करते हैं।
Essence
प्रभु का मार्ग पालन व पूरण करनेवाला है। प्रभु ज्ञानदीप्त हैं, सर्वेश्वर हैं, विश्वसनीयतम आधार हैं। सर्वत्र प्रभु की शक्ति कार्य करती हुई दृष्टिगोचर होती है। प्रभु पृथिवी की भाँति सर्वाधार हैं।।
Subject
प्रतिमानं पृथिव्याः

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