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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 19/28/5

72 Sukta
10 Mantra
19/28/5
Devata- दर्भमणिः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दर्भमणि सूक्त
Mantra with Swara
भि॒न्द्धि द॑र्भ स॒पत्ना॑न्मे भि॒न्द्धि मे॑ पृतनाय॒तः। भि॒न्द्धि मे॒ सर्वा॑न्दु॒र्हार्दो॑ भि॒न्द्धि मे॑ द्विष॒तो म॑णे ॥

भि॒न्द्धि। द॒र्भ॒। स॒ऽपत्ना॑न्। मे॒। भि॒न्द्धि। मे॒। पृ॒त॒ना॒ऽय॒तः। भि॒न्द्धि। मे॒। सर्वा॑न्। दुः॒ऽहार्दः॑। भि॒न्द्धि। मे॒। द्वि॒ष॒तः। म॒णे॒ ॥२८.५॥

Mantra without Swara
भिन्द्धि दर्भ सपत्नान्मे भिन्द्धि मे पृतनायतः। भिन्द्धि मे सर्वान्दुर्हार्दो भिन्द्धि मे द्विषतो मणे ॥

भिन्द्धि। दर्भ। सऽपत्नान्। मे। भिन्द्धि। मे। पृतनाऽयतः। भिन्द्धि। मे। सर्वान्। दुःऽहार्दः। भिन्द्धि। मे। द्विषतः। मणे ॥२८.५॥

Meaning
१.हे (दर्भ) = वीर्यमणे! (मे) = मेरे (सपत्नान्) = शत्रुभूत रोगों को (भिन्धि) = विदीर्ण कर डाल। ये (पूतनायत:) = मुझपर सेना से चढ़ाई करनेवाले-नाना प्रकार के उपद्रवों के साथ आक्रमण करनेवाले इन रोगों को (भिन्धि) = नष्ट कर। २. मेरे प्रति (सर्वान्) = सब (दुर्हार्दिः) = दुष्ट हृदयवाले मेरा अशुभ चाहनेवाले शत्रुओं को (भिन्धि) = विदीर्ण कर। हे (मणे) = वीर्य! तू (मे द्विषत:) = मेरे साथ अप्रीतिवाले इन रोगरूप शत्रुओं को (भिन्धि) = विदीर्ण कर।
Essence
रोग हमारे सपत्न है-हमारे शरीर पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं। ये रोग विविध उपद्रवोंरूप सैन्य के साथ हमपर आक्रमण करते हैं। ये हमारे प्रति दुष्टभाववाले हैं-ये कभी हमारा भला नहीं करते। इनकी हमारे साथ कोई प्रीति नहीं। वीर्य शरीर में सुरक्षित होने पर इनका विदारण कर देता है।
Subject
रोगों का विदारण

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