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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 16/3/5

9 Sukta
6 Mantra
16/3/5
Devata- साम्नी उष्णिक् Rishi- आदित्य Chhanda- ब्रह्मा Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
बृह॒स्पति॑र्मआ॒त्मा नृ॒मणा॒ नाम॒ हृद्यः॑ ॥

बृह॒स्पति॑: । मे॒ । आ॒त्मा । नृ॒ऽमना॑: । नाम॑ । हृद्य॑: ॥३.५॥

Mantra without Swara
बृहस्पतिर्मआत्मा नृमणा नाम हृद्यः ॥

बृहस्पति: । मे । आत्मा । नृऽमना: । नाम । हृद्य: ॥३.५॥

Meaning
१. (बृहस्पति:) = यह ज्ञान का स्वामी प्रभु (मे आत्मा) = मेरी आत्मा है-मुझमें प्रभु का निवास है। मैं भी प्रभु के शरीर के समान हूँ। वह प्रभु (नृमणा नाम) = 'नृमणा' नामवाला है-'नृषु मनो यस्य' उन्नति-पथ पर चलनेवालों में मनवाला है, उनका सदा ध्यान करनेवाला है। वे प्रभ (हृद्य:) = हम सबके हदयों में निवास करनेवाले हैं। २. इस प्रभु का स्मरण करते हुए (मे) = मेरा (हृदयम्) = हृदय (असंतापम्) = सन्तापशून्य है। (गव्यूति: उर्वी) = इन्द्रियरूप गौओं का प्रचारक्षेत्र विशाल है, अर्थात् मेरी इन्द्रियाँ दूर-दूर के विषयों का भी ज्ञान प्राप्त करनेवाली हैं और विशालहित के साधक कर्मों को करने में तत्पर हैं। (विधर्मणा) = विशिष्ट धारणशक्ति के द्वारा मैं (समुद्रः अस्मि) = सदा आनन्दमय [स-मुद्] जीवनवाला हूँ अथवा समुद्र जैसे सब रत्नों का आधार है, उसीप्रकार मैं भी धारणात्मक कर्मों का आधार बनता हूँ।
Essence
प्रभु को मैं अपनी आत्मा जानूं। वे प्रभु हमारा ध्यान करनेवाले हैं। हमारे हृदयों में उनका वास है। इस प्रभु का स्मरण करता हुआ मैं सन्तापशून्य हृदयवाला, विशाल दृष्टिकोणवाला तथा धारणात्मकशक्ति से आनन्दमय जीवनवाला बनें।
Subject
असन्तापं मे हृदयम्

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