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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 11/8/3

10 Sukta
34 Mantra
11/8/3
Devata- अध्यात्मम्, मन्युः Rishi- कौरुपथिः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
दश॑ सा॒कम॑जायन्त दे॒वा दे॒वेभ्यः॑ पु॒रा। यो वै तान्वि॒द्यात्प्र॒त्यक्षं॒ स वा अ॒द्य म॒हद्व॑देत् ॥

दश॑ । सा॒कम् । अ॒जा॒य॒न्त॒ । दे॒वा: । दे॒वेभ्य॑: । पु॒रा । य: । वै । तान् । वि॒द्यात् । प्र॒ति॒ऽअक्ष॑म् । स: । वै । अ॒द्य । म॒हत् । व॒दे॒त् ॥१०.३॥

Mantra without Swara
दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा। यो वै तान्विद्यात्प्रत्यक्षं स वा अद्य महद्वदेत् ॥

दश । साकम् । अजायन्त । देवा: । देवेभ्य: । पुरा । य: । वै । तान् । विद्यात् । प्रतिऽअक्षम् । स: । वै । अद्य । महत् । वदेत् ॥१०.३॥

Meaning
१. (पुरा) = सृष्टि के प्रारम्भ में (देवेभ्य:) = सूर्य आदि ब्रह्माण्ड के देवों से (दश देवा:) = शरीरस्थ चक्षु आदि दस देव (साकम् अजायन्त) = साथ-साथ प्रादुर्भूत हुए [सूर्यः चक्षुर्भूत्वा अक्षिणी प्राविशत्, अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत्, वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्०] २. (य:) = जो भी उपासक (वै) = निश्चय से (तान्) = उन देवों को (प्रत्यक्षं विद्यात्) = अपरोक्षरूप में जानता है-अर्थात् इन देवों का साक्षात्कार करता है, (सः वै) = वही निश्चय से (अद्य) = अब (महद् वदेत्) = देशकालकृत परिच्छेदरहित ब्रह्म को प्रतिपादित [उपदिष्ट] करता है। उसे इन देवों में प्रभु की महिमा दीखती है। यह महिमा उसे प्रभु का आभास प्राप्त कराती है।
Essence
शरीर में ब्रह्माण्ड के सूर्य आदि देवों से चक्षु आदि देव उत्पन्न होते हैं। इन देवों को जाननेवाला ही प्रभु की महिमा को देखनेवाला बनता है।
Subject
देवप्रत्यक्ष से महद् ब्रह्म का ज्ञान

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