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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 10/6/4

10 Sukta
35 Mantra
10/6/4
Devata- फालमणिः, वनस्पतिः Rishi- बृहस्पतिः Chhanda- गायत्री Suktam- मणि बन्धन सूक्त
Mantra with Swara
हिर॑ण्यस्रग॒यं म॒णिः श्र॒द्धां य॒ज्ञं महो॒ दध॑त्। गृ॒हे व॑सतु॒ नोऽति॑थिः ॥

हिर॑ण्यऽस्रक् । अ॒यम् । म॒णि: । श्र॒ध्दाम् । य॒ज्ञम् । मह॑: । दध॑त् । गृ॒हे । व॒स॒तु॒ । न॒: । अति॑थि: ॥६.४॥

Mantra without Swara
हिरण्यस्रगयं मणिः श्रद्धां यज्ञं महो दधत्। गृहे वसतु नोऽतिथिः ॥

हिरण्यऽस्रक् । अयम् । मणि: । श्रध्दाम् । यज्ञम् । मह: । दधत् । गृहे । वसतु । न: । अतिथि: ॥६.४॥

Meaning
१. शरीर में सुरक्षित (अयं मणिः) = यह वीर्यमणि (हिरण्यस्त्रक्) = हितरमणीय तत्वों को उत्पन्न करनेवाला है [सृज्]। यह (श्रद्धाम्) = हृदय में श्रद्धा को, (यज्ञम्) = हाथों में यज्ञों [श्रेष्ठतम् कर्मों] को, तथा (महः) = शरीर में तेजस्विता को (दधत्) = धारण करता हुआ (अतिथि:) = [अत सातत्यगमने] शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग में गतिवाला होता हुआ (नः गृहे) = हमारे शरीरगृह में (वसतु) = निवास करे।
Essence
यह वीर्यमणि शरीर में सुरक्षित होने पर हितरमणीय तत्त्वों को जन्म देती है। यह हृदय में श्रद्धा, हाथों में यज्ञ तथा शरीर में तेज को स्थापित करती है। प्रभुकृपा से यह हमारे शरीर-गृह में ही, गति करती हुई, निवास करे।
Subject
हिरण्यस्त्रक' मणि

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