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Atharvaveda - Mantra 27

Atharvaveda 10/6/27

10 Sukta
35 Mantra
10/6/27
Devata- फालमणिः, वनस्पतिः Rishi- बृहस्पतिः Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- मणि बन्धन सूक्त
Mantra with Swara
यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॑र्दे॒वेभ्यो॒ असु॑रक्षितिम्। स मा॒यं म॒णिराग॑म॒त्तेज॑सा॒ त्विष्या॑ स॒ह यश॑सा की॒र्त्या स॒ह ॥

यम् । अब॑ध्नात् । बृह॒स्पति॑: । दे॒वेभ्य॑: । असु॑रऽक्षितिम् । स: । मा॒ । अ॒यम् । म॒णि: । आ । अ॒ग॒म॒त् । तेज॑सा । त्विष्या॑ । स॒ह । यश॑सा । की॒र्त्या᳡ । स॒ह ॥६.२७॥

Mantra without Swara
यमबध्नाद्बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्। स मायं मणिरागमत्तेजसा त्विष्या सह यशसा कीर्त्या सह ॥

यम् । अबध्नात् । बृहस्पति: । देवेभ्य: । असुरऽक्षितिम् । स: । मा । अयम् । मणि: । आ । अगमत् । तेजसा । त्विष्या । सह । यशसा । कीर्त्या । सह ॥६.२७॥

Meaning
१. (बृहस्पतिः) = [मन्त्र २२ में द्रष्टव्य है]२. (सः अयं मणि:) = वह यह मणि (मा) = मुझे (पयसा सह ऊर्जया) = शक्तियों के आप्यायन के साथ बल व प्राणशक्ति के साथ तथा (श्रिया सह) = शोभा के साथ (द्रविणेन) = कार्यसाधक धन के साथ (आगमत्) = प्राप्त हो। (त्विष्या सह तेजसा) = कान्तियुक्त तेज के साथ तथा (कीर्त्या सह) = कीर्ति [fame] के साथ यशसा सौन्दर्य [beauty, splendour] को लेकर, यह मणि मुझे प्राप्त हो तथा यह मणि (सर्वाभि: भूतिभिः सह) = सब ऐश्वयों के साथ मुझे प्राप्त हो।
Essence
शरीर में सुरक्षित वीर्यमणि हमारे लिए 'शक्तियों के आप्यायन के साथ ऊर्जा को प्रास कराती है. श्री के साथ द्रविण देती है। कान्ति के साथ तेज तथा कीर्ति के साथ यश देनेवाली है। यह सब ऐश्वर्यों को प्राप्त कराती है।
Subject
ऊर्जया-भूतिभिः

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