Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 42

48 Mantra
7/42
Devata- सूर्य्यो देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ꣳ सूर्य॑ऽआ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च॒ स्वाहा॑॥४२॥

चित्र॒म्। दे॒वाना॑म्। उत्। अ॒गा॒त्। अनी॑कम्। चक्षुः॑। मि॒त्रस्य॑। वरु॑णस्य। अ॒ग्नेः। आ। अ॒प्राः॒। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। अ॒न्तरि॑क्षम्। सूर्य्यः॑। आ॒त्मा। जग॑तः। त॒स्थुषः॑। च॒। स्वाहा॑ ॥४२॥

Mantra without Swara
चित्रन्देवानामुदगादनीकञ्चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षँ सूर्य ऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ॥

चित्रम्। देवानाम्। उत्। अगात्। अनीकम्। चक्षुः। मित्रस्य। वरुणस्य। अग्नेः। आ। अप्राः। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। अन्तरिक्षम्। सूर्य्यः। आत्मा। जगतः। तस्थुषः। च। स्वाहा॥४२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( देवानाम् ) समस्त देवों, विद्वानों और राज्य के पदाधिकारियों में से यह राजा ( चित्रम् ) अति पूजन ( अनीकम् ) सर्वशिरोमणि, सब से 
मुख्य होकर ( उद् अगात् ) उदय को प्राप्त होता है। वह (मित्रस्य वरुणस्य अग्नेः ) मित्र, वरुण और इन पदाधिकारियों का भी ( चक्षुः ) आंख के समान मार्ग दिखाने वाला या उन पर निरीक्षक रूप से नियुक्त है । वह ( द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम् ) द्यौ, पृथिवी और अन्तरिक्ष, राजा, प्रजा और 
बीच के शासक सबको( आ प्रा ) पूर्ण करता है वह ( सूर्यः )समान सर्वप्रेरक तेजस्वी ( जगतः ) जगत और  ( तस्थुषः च ) स्थावर पशु और जंगल पर्वत,नगर आदि समस्त धनों का ( आत्मा ) आत्मा, अपनाने स्वामी ( स्वाहा ) कहा जाता है । शत० ४ । ३ । ४ । । १० ॥ 
ईश्वर पक्ष में - इस शरीर में आत्मा और ब्रह्माण्ड शरीर में परमात्मा ( देवानाम् अनीकं ) समस्त देवों, दिव्य शक्तियों में मुख्य ( चित्रम् ) सबका पूजनीय मित्र, वरुण, अग्नि, वायु, जल और आग सबका ( चक्षुः ) द्रष्टा और सबका प्रकाशक है । यह द्यौ, पृथ्वी, अन्तरिक्ष सबका पालक है । स्थावर और जंगम सबका आत्मा, सबका स्वामी, सब में व्यापक है । ( स्वाहा ) उसको स्तुति करो। इस देह में आत्मा ( देवानाम् ) चक्षु आदि इन्द्रियों का ( अनीकं ) नेता । मित्र, वरुण, प्राणापान और जाठर अग्नि का प्रवर्त्तक, शिर, मध्य और चरण भाग तीनों का पालक, पोषक गतिशील, अंग और स्थिर धातु सबका स्वामी है। वह 'आत्मा' कहाता है । उसको उत्तम रीति से ज्ञान करो ॥ 
 
Subject
जातवेदा, राजा और परमेश्वर और सूर्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
कुत्स ऋषिः । सूर्यो देवता । भुरिगार्षी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥