Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 41

48 Mantra
7/41
Devata- सूर्य्यो देवता Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑। दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॒ꣳ स्वाहा॑॥४१॥

उत्। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। त्यम्। जा॒तवे॑दस॒मिति॑ जा॒तऽवे॑दसम्। दे॒वम्। व॒ह॒न्ति॒। के॒तवः॑। दृ॒शे। विश्वा॑य। सूर्य्य॑म्। स्वाहा॑ ॥४१॥

Mantra without Swara
उदु त्यञ्जातवेदसन्देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यँ स्वाहा ॥

उत्। ऊँऽइत्यूँ। त्यम्। जातवेदसमिति जातऽवेदसम्। देवम्। वहन्ति। केतवः। दृशे। विश्वाय। सूर्य्यम्। स्वाहा॥४१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( त्वं ) उस ( जातवेदसम् ) ऐश्वर्यवान् ( देवम् ) देव, राजा को ( केतवः ) ज्ञानवान् पुरुष भी ( उद् वहन्ति ) अपने ऊपर आदर से धारण करते उसको अपने सिरमाथे, स्वामी स्वीकार करते हैं । उस ( विश्वाय ) समस्त कार्यों और प्रजाओं के ( इशे ) दर्शन करने या कराने वाले साक्षीरूप ( सूर्यम् ) सूर्य के समान सर्वप्रेरक राजा को ( स्वाहा ) उत्तम कहा जाता है ॥ 
परमेश्वर पक्ष में-- समस्त पदार्थों का दर्शन कराने के लिये जिस प्रकार ( सूर्यम् ) सूर्य को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं और उसको ( केतवः ) रश्मियें प्राप्त हैं, उसी प्रकार समस्त संसार को दर्शाने वाले उस परमेश्वर को भी सूर्य कहते हैं । समस्त ( केतवः ) ज्ञान उसी परमेश्वर वेदों के उत्पत्ति स्थान को ही बतलाते हैं । शत० ४ । ३ । ४ । ९॥ 
Subject
जातवेदा, राजा और परमेश्वर और सूर्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रस्कण्व ऋषिः । सूर्यो देवता । भुरिगार्षी गायत्री । षड्जः ॥