Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 8

37 Mantra
6/8
Devata- बृहस्पतिर्देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- प्राजापत्या अनुष्टुप्,भूरिक् प्राजापत्या बृहती, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
रेव॑ती॒ रम॑ध्वं॒ बृह॑स्पते धा॒रया॒ वसू॑नि। ऋ॒तस्य॑ त्वा देवहविः॒ पाशे॑न प्रति॑मुञ्चामि॒ धर्षा॒ मानु॑षः॥८॥

रेव॑तीः। रम॑ध्वम्। बृह॑स्पते। धा॒रय॑। वसू॑नि। ऋ॒तस्य॑। त्वा॒। दे॒व॒ह॒वि॒रिति॑ देवऽहविः। पाशे॑न। प्रति॑। मु॒ञ्चा॒मि॒। धर्ष॑। मानु॑षः ॥८॥

Mantra without Swara
रेवती रमध्वं बृहस्पते धारया वसूनि । ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रति मुञ्चामि धर्षा मानुषः ॥

रेवतीः। रमध्वम्। बृहस्पते। धारय। वसूनि। ऋतस्य। त्वा। देवहविरिति देवऽहविः। पाशेन। प्रति। मुञ्चामि। धर्ष। मानुषः॥८॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( रेवतीः ) ऐश्वर्य पशु और धन से सम्पन्न प्रजाओ ! आप लोग (रमध्वम् ) खूब आनन्द प्रसन्न होकर विचरण करो । हे ( बृहस्पते ) बृहती, वेद वाणी के पालक विद्वान् पुरुष ! आचार्य ! तू ( वसूनि ) नाना ऐश्वयों को और पशु सम्पत्ति को भी ( धारय ) धारण कर। और ( ऋतस्य पाशेन ) ऋत, सत्य ज्ञान और न्याय के पाश से ( त्वा) तुझे (देवहविः ) देवों विद्वानों के प्राप्त करने योग्य विज्ञान और चरित्र ही ( प्रतिमुञ्चामि ) धारण कराता हूं | तू हे विद्वन् ! ( मानुषः ) मनुष्य, मननशील होकर ( धर्ष ) सब अज्ञानों को घर्षण कर, बलपूर्वक वश कर ॥ 
राजा के पक्ष में प्रजाएं राष्ट्र में आनन्दित रहे । हे बड़े राष्ट्र के पालक ! तू समस्त ऐश्वर्यो को धारण कर । ऋत, सत्य न्याय के पाश या व्यवस्था से देवोचित हविः अर्थात् आदान योग्य कर, बलि आदि के द्वारा बांधता हूं । तू अब मनुष्य होकर भी प्रजा के भीतर के दुष्ट पुरुषों और शत्रुओं और प्रजाओं को परास्त कर ॥
Subject
समृद्ध प्रजा और राजा ।
Footenote
 ८ - दीर्घतमा ऋषिः । बृहस्पतिर्देवता । द० । ० धर्षान्मानुषः' इति काण्व०॥ १ रेवती। २ ऋतस्य।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
पशवो बृहस्पतिर्देवता । (१) प्राजापत्यानुष्टुप् ऋषभ: । निचृत् प्राजापत्या बृहती । मध्यमः ॥