Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 4

37 Mantra
6/4
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
विष्णोः॒ कर्म्मा॑णि पश्यत॒ यतो॑ व्र॒तानि॑ पस्प॒शे। इन्द्र॑स्य॒ युज्यः॒ सखा॑॥४॥

विष्णोः॑ कर्म्मा॑णि। प॒श्य॒त॒। यतः॒। व्र॒तानि॑। प॒स्प॒शे। इन्द्र॑स्य। युज्यः॑। सखा॑ ॥४॥

Mantra without Swara
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥

विष्णोः कर्म्माणि। पश्यत। यतः। व्रतानि। पस्पशे। इन्द्रस्य। युज्यः। सखा॥४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
-हे जनो ! (विष्णोः ) व्यापक ईश्वर के कर्माणि ) उन नाना कार्यों को जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और व्यवस्था के कार्यों को ( पश्यत ) देखो ( धतः ) जिनके द्वारा वह ( व्रतानि ) नाना नियमों को ( पस्पशे ) बांधता है । वह परमेश्वर ( इन्द्रस्य ) घाटमा का ( युज्य : ) समाधि में उसके प्राप्त होने वाला ( सखा ) उसका मित्र है । अथवा हममें से प्रत्येक ईश्वर का मित्र है॥
 
राजा के पक्ष में- ( विष्णोः कर्माणि पश्यत ) हे राजसभा के सभासदो ! राष्ट्र के व्यापक शक्तिवाले राजा के उन कर्मों को निरीक्षण करो । ( यतः ) जिनसे वह नाना नियमों को ( पस्पशे) बांधता है। तुममें से प्रत्येक ( इन्द्रस्य ) इन्द्र, ऐश्वर्यवान् राजा का ( युज्यः ) योगदायी ( सखा ) मित्र है ||
Subject
ईश्वर और राजा के कर्म ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
मेधातिथिर्ऋषिः । विष्णुर्देवता । निचृदार्षी  गायत्री । षड्जः ॥