Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 35

37 Mantra
6/35
Devata- द्यावापृथिव्यौ देवते Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
मा भे॒र्मा संवि॑क्था॒ऽऊर्जं॑ धत्स्व॒ धिष॑णे वी॒ड्वी स॒ती वी॑डयेथा॒मूर्जं॑ दधाथाम्। पा॒प्मा ह॒तो न सोमः॑॥३५॥

मा। भेः॒। मा। सम्। वि॒क्थाः॒। ऊर्ज॑म्। ध॒त्स्व॒। धिष॑णे॒ऽइति॑ धिष॑णे। वीड्वीऽइति॑ वी॒ड्वी। स॒ती॑ऽइति॑ स॒ती। वी॒ड॒ये॒था॒म्। ऊ॑र्जम्। द॒धा॒था॒म्। पा॒प्मा। ह॒तः। न। सोमः॑ ॥३५॥

Mantra without Swara
मा भेर्मा सँविक्था ऊर्जन्धत्स्व धिषणे वीड्वी सती वीडयेथामूर्जन्दधाथाम् । पाप्मा हतो न सोमः ॥

मा। भेः। मा। सम्। विक्थाः। ऊर्जम्। धत्स्व। धिषणेऽइति धिषणे। वीड्वीऽइति वीड्वी। सतीऽइति सती। वीडयेथाम्। ऊर्जम्। दधाथाम्। पाप्मा। हतः। न। सोमः॥३५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! और हे प्रजागण ! तू ( मा भेः ) भय मत कर । ( मा संविक्थाः ) तू भय से कंपित न हो । तू ( ऊर्ज धत्स्व ) 'ऊर्ज' बल को धारण कर । हे राजा और प्रजा तुम दोनों ! (धिषणे ) एक दूसरे का आश्रय होकर आकाश और पृथिवी या सूर्य और पृथिवी के समान दोनों ( वीड्वी सती ) वीर्यवान्, बलवान् दृढ़, हृष्ट पुष्ट होकर ( वीडयेथाम् ) एक दूसरे का बल बढ़ाओ। और अपने को बलवान् करो । इस प्रकार युद्धादि के अवसर पर भी यद्यपि राजा पर आक्रमण होगा तब भी प्रजा और राजा दोनों के बलिष्ट होने पर ( पाप्मा हतः ) पाप करने वाला दुष्ट शत्रु पुरुष ही मारा जाय । ( न सोमः ) सोम, सवैप्रेरक राजा या राष्ट्र का नाश नहीं होता । शत० ३ । ९ । ४ । १६-१८ ॥ 
गृहस्थ पक्ष में- हे पुरुष और हे स्त्री ! तुम दोनों गृह के पालन के कार्य में मत डरो। भय से कम्पित मत होओ। एक दूसरे के आश्रय और ( धिषणे ) बुद्धिमान और आत्मसन्मान, बलवान्, (बीड्वी) वीर्यवान् होकर सदा बलवान् दृढ़ बने रहो और ऊर्ज, पराक्रम को धारण करो इस प्रकार समस्त पाप नष्ट हो जायगा । और 'सोम' अर्थात् परस्पर का गृहस्थ सुख या आह्लाद कभी नष्ट नहीं होगा। 
Subject
राजा प्रजा का परस्पर अभय,
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
द्यावापृथिव्यौ देवते । भुरिगार्ष्यनुष्टुप् । गान्धारः।