Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 25

37 Mantra
6/25
Devata- सोमो देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- आर्षी विराट अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
हृ॒दे त्वा॒ मन॑से त्वा॒ दि॒वे त्वा॒ सूर्या॑य त्वा। ऊ॒र्ध्वमि॒मम॑ध्व॒रं दि॒वि दे॒वेषु॒ होत्रा॑ यच्छ॥२५॥

हृ॒दे। त्वा॒। मन॑से। त्वा॒। दि॒वे। त्वा॒। सूर्य्या॑य। त्वा॒। ऊ॒र्ध्वम्। इ॒मम्। अ॒ध्व॒रम्। दि॒वि। दे॒वेषु॑। होत्राः॑। य॒च्छ॒ ॥२५॥

Mantra without Swara
हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा । ऊर्ध्वमिममध्वरन्दिवि देवेषु होत्रा यच्छ ॥

हृदे। त्वा। मनसे। त्वा। दिवे। त्वा। सूर्य्याय। त्वा। ऊर्ध्वम्। इमम्। अध्वरम्। दिवि। देवेषु। होत्राः। यच्छ॥२५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे कन्ये ! मैं तुझे ( हृदे ) हृदय वाले, प्रेम से युक्त, पुरुष के लिये, (मनसे) मन वाले या ज्ञानी, ( दिवे ) प्रकाश वाले, तेजस्वी और ( सूर्याय ) सूर्य के समान कान्तिमान्, वरण करने योग्य पुरुष के हाथ [ यच्छामि ] प्रदान करता हूं। और तू हे कन्ये ! ( इमम् ) इस वरण योग्य (अध्वरं ) अपराजित, अहिंसक ( ऊर्ध्वम् ) उत्कृष्ट पद पर स्थित पुरुष को ( दिवि ) ज्ञान प्रकाश में स्थित ( देवेषु ) देव विद्वानों के बीच में ( होत्रा: ) जो आहुति देने वाले या दान देने योग्य गृहस्थ पुरुष हैं उनके नियम में ( यच्छ ) बांध । अथवा वरण करने हारी कन्या वर के प्रति कहती है। मैं ( हृदे त्वा मन से दिवे वा, सूर्याय त्वा वृणोमि ) अपने हृदय, चित्त, और प्रकाश या सुख के और अपने प्रेरक पति बनाने के निमित्त वरण करती हूं। (इमम् उर्ध्वम् अध्वरम् ) तू इस गृहस्थ रूप यज्ञ को ( दिवि ) सुख लाभ के लिये ( देवेषु ) विद्वान पुरुषों में से भी जो ( होत्राः ) ज्ञान ऐश्वर्य प्रदान करने वाले यज्ञशील पुरुष हैं उनको ( यच्छ ) प्रदान कर उनके अधीन कर॥ 
राजा के पक्ष में-- हे राजन् तेरे हृदय मन, तेज और राज पद के लिये तुझे हम प्रजाएं वरण करती हैं। ज्ञान, प्रकाश में जो विद्वानों में भी ( होत्राः ) उत्तम दानशील उदार पुरुष हैं तू इस राष्ट्रमय यज्ञ को उनके 
अधीन कर ॥ शत० ३ । ९। ३ ।१ -५ ॥ 
Subject
स्वयं वरा के प्रयोजन ।
Footenote
  २५--ऊर्ध्वो ऽध्वरं० इति काण्व ० ॥ 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
सोमो देवता । आर्षी विराड् अनुष्टुप् । गान्धारः॥