Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 35

43 Mantra
5/35
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- अतिजगती Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ज्योति॑रसि वि॒श्वरू॑पं॒ विश्वे॑षां दे॒वाना॑ स॒मित्। त्वꣳ सो॑म तनू॒कृद्भ्यो॒ द्वेषो॑भ्यो॒ऽन्यकृतेभ्यऽउ॒रु य॒न्तासि॒ वरू॑थ॒ꣳ स्वाहा॑। जुषा॒णोऽ अ॒प्तुराज्य॑स्य वेतु॒ स्वाहा॑॥३५॥

ज्योतिः॑। अ॒सि॒। वि॒श्वरू॑प॒मिति॑ वि॒श्वऽरू॑पम्। विश्वे॑षाम्। दे॒वाना॑म्। स॒मिदिति॑ स॒म्ऽइत्। त्वम्। सो॒म॒। त॒नू॒कृद्भ्य॒ इति॑ तनू॒कृत्ऽभ्यः॑। द्वेषो॑भ्य॒ इति॒ द्वेषः॑ऽभ्यः। अ॒न्यकृ॑तेभ्य इत्य॒न्यऽकृ॑तेभ्यः। उ॒रु। य॒न्ता। अ॒सि॒। वरू॑थम्। स्वाहा॑। जु॒षा॒णः। अ॒प्तुः। आज्य॑स्य। वे॒तु॒। स्वाहा॑ ॥३५॥

Mantra without Swara
ज्योतिरसि विश्वरूपँविश्वेषान्देवानाँ समित् । त्वँ सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषोभ्यो न्यकृतेभ्यऽउरु यन्तासि वरूथँ स्वाहा जुषाणोऽअप्तुराज्यस्य वेतु स्वाहा ॥

ज्योतिः। असि। विश्वरूपमिति विश्वऽरूपम्। विश्वेषाम्। देवानाम्। समिदिति सम्ऽइत्। त्वम्। सोम। तनूकृद्भ्य इति तनूकृत्ऽभ्यः। द्वेषोभ्य इति द्वेषःऽभ्यः। अन्यकृतेभ्य इत्यन्यऽकृतेभ्यः। उरु। यन्ता। असि। वरूथम्। स्वाहा। जुषाणः। अप्तुः। आज्यस्य। वेतु। स्वाहा॥३५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! तू ( विश्वरूपं ज्योतिः असि ) नानारूप से प्रकाशित होने वाला या सब प्रकार का ज्योति : प्रकाशक, सूर्य के समान तेजस्वी है । और ( विश्वेषां देवानाम् ) समस्त देवों, विद्वानों और राजपदाधिकारियों को ( सम्-इत् ) अच्छी प्रकार तेजस्वी बनाने और चमकाने वाला है । हे (सोम) सब के प्रेरक राजन् ! तू ( तनूकृद्भ्यः) शरीरों के नाश करने वाले ( द्वेषोभ्यः ) और परस्पर द्वेष कलह करने वाले और (अन्यकृतेभ्यः ) अन्य अर्थात् शत्रुओं से किये गये या लगाये गये गूढ शत्रुओं से भी राष्ट को बचाने के लिये ( उरु वरूथम् ) शत्रु के वारण करने में समर्थ विशाल सेना बल को ( यन्तासि ) नियमन करता है। ( सु- आहा ) तेरे निमित्त हमारा यह उत्तम त्याग है (आज्यस्य ) आज्य, घृत के समान पुष्टिकारक या आजि, संग्राम योग्य बलवीर्य को ( जुषाणः ) सेवन एवं प्राप्त करता हुआ (अप्तु: ) आप्त राजा ( स्वाहा ) उत्तम व्यवस्था से, इस उत्तम आहुति को ( वेतु ) प्राप्त करे । 
ईश्वर पक्ष में -- सब देवों, दिव्य पदार्थों का प्रकाशक, 'विश्वरूप' ज्योति परमेश्वर है । हे सोम परमेश्वर ! हमारे शरीर के नाशक और अन्य सब द्वेषों को भी नियमन करने वाला तू ही स्वयं बड़ा भारी बल है । तू ही सर्व व्यापक समस्त आज्य=बल वीर्य का स्वामी होकर हमें भली प्रकार प्राप्त है । 
 
Subject
राजा के कर्त्तव्य ।
Footenote
३५ -- अग्निर्देवता । द० । क्रतुर्भार्गव ऋषिः । सर्वा० ॥ ३५ -- अगस्त्यऋषिः । द० ॥ 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिःऋषिः। क्रतुर्भार्गवऋषिः। विश्वेदेवाः सोमोग्निर्वा देवता । निचृद् ब्राह्मी पंक्तिः । पञ्चमः ।