Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 31

43 Mantra
5/31
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- विराट् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि॒भूर॑सि प्र॒वाह॑णो॒ वह्नि॑रसि हव्य॒वाह॑नः। श्वा॒त्रोऽसि प्रचे॑तास्तु॒थोऽसि वि॒श्ववे॑दाः॥३१॥

वि॒भूरिति॒ वि॒ऽभूः। अ॒सि॒। प्रवा॒ह॑णः। प्रवा॒ह॑न॒ इति॑ प्र॒ऽवाह॑नः। वह्निः॑। अ॒सि॒। ह॒व्य॒वाह॑न॒ इति॑ हव्य॒ऽवाह॑नः। श्वा॒त्रः। अ॒सि॒। प्रचे॑ता॒ इति॒ प्रऽचे॑ताः। तु॒थः। अ॒सि॒। वि॒श्ववे॑दा॒ इति॑ वि॒श्वऽवे॑दाः ॥३१॥

Mantra without Swara
विभूरसि प्रवाहणो वह्निरसि हव्यवाहनः श्वात्रो सि प्रचेतास्तुथोसि विश्ववेदाः ॥

विभूरिति विऽभूः। असि। प्रवाहणः। प्रवाहन इति प्रऽवाहनः। वह्निः। असि। हव्यवाहन इति हव्यऽवाहनः। श्वात्रः। असि। प्रचेता इति प्रऽचेताः। तुथः। असि। विश्ववेदा इति विश्वऽवेदाः॥३१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! तू ( विभूः असि ) विशेष ऐश्वर्य और सामर्थ्य से युक्त और ( प्रवाहण :) महानद नौका या रथ के समान सब प्रजाओं के भार का अपने ऊपर उठा लेने में समर्थ है। और हे विद्वन् ! (वह्निः) जिस प्रकार अग्नि समस्त ( हव्यवाहनः ) आहवनीय पदार्थों को वहन करता है उसी प्रकार तू सभी राज्य के पदार्थों और कार्यों को वहन करने में समर्थ और ( हव्य वाहनः ) ग्राह्य पदार्थों और समस्त ज्ञानों का धारण करनेहारा ( असि) है । हे विद्वन् ! तू ( श्र्वात्रः ) ज्ञानवान् सर्वत्र पहुंचने वाला या कल्याण- कारी, ( प्रचेताः ) प्राण के समान सबको चेतना देनेवाला, सबका शिक्षक और ज्ञानदाता है । हे विद्वन् ! तू ( विश्ववेदाः ) जिस प्रकार सब प्राणियों वायु समस्त विश्व के पदार्थों में व्याप्त है उसी प्रकार तु भी सबको प्राप्त करनेवाला है, सर्वज्ञाता या सब धनों का स्वामी और ( तुथः असि ) तू ज्ञान का वर्धक या सबको ऐश्वर्य बांटने वाला है। इस प्रकार यहाँ चार विशेष पदाधिकारियों या राजा के हो चार स्वरूपों का वर्णन है । 
तुथो  स्म वै विश्ववेदा देवानां दक्षिणा विभजतीति । तैत्ति० ।
शिवा ह्यापस्तस्मादाह श्वात्राः स्थेति । श० ३ । ७ । ४ । १६ ॥
Subject
राजा के कुछ उच्च अधिकारसूचक पद ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिःऋषिः।धिष्ण्या अग्नयो देवताः । विराडार्च्युनुष्टुप् । गान्धारः ॥