Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 30

43 Mantra
5/30
Devata- ईश्वरसभाध्यक्षौ देवते Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- आर्ची उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्य॒ स्यूर॒सीन्द्र॑स्य ध्रु॒वोऽसि ऐ॒न्द्रम॑सि वैश्वदे॒वम॑सि॥३०॥

इन्द्र॑स्य। स्यूः। अ॒सि॒। इन्द्र॑स्य। ध्रु॒वः। अ॒सि॒। ऐ॒न्द्रम्। अ॒सि॒। वै॒श्व॒दे॒वमिति॑ वैश्वऽदे॒वम्। अ॒सि॒ ॥३०॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य स्यूरसीन्द्रस्य धु्रवोसि ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि ॥

इन्द्रस्य। स्यूः। असि। इन्द्रस्य। ध्रुवः। असि। ऐन्द्रम्। असि। वैश्वदेवमिति वैश्वऽदेवम्। असि॥३०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे सभापते ! हे राजन् ! तू ( इन्द्रस्य ) इन्द्र, ऐश्वर्यवान् राज- पद का ( स्यूः ) सूत्र के समान सीकर उसे दृढ़ करनेवाला है । जिस प्रकार सूत्र वस्त्र के खण्डों को सीकर दृढ़ कर देता है उसी प्रकार राजा भी राष्ट्रों के भिन्न र ऐश्वर्यवान् भागों को सीकर दृढ़ कर देता है | ( इन्द्रस्य ) इन्द्र, राजा के पद को तू ( ध्रुवः ) ध्रुव, उसको स्थापन करनेवाला या उस पर स्थिररूप से विराजने वाला है। हे राजसिंहासन पद ! या हे राष्ट्र !  तू ( इन्द्रम् ) इन्द्र का पद ( असि ) है। तू ( वैश्वदेवम् असि ) समस्त देव, विद्वान् पुरुषों को सम्मिलित एक सामूहिक मानपद है । 
इसी प्रकार ईश्वर पक्ष में- ईश्वर, इन्द्र आत्मा को अपने साथ सीनेवाला उसको ध्रुव आश्रय, उसका प्रेमी, स्वयं ऐश्वर्यवान्, देवों का हितकारी है ॥
Subject
इन्द्र का पद ।
Footenote
३० ईश्वरसभाध्यक्षौ । द० ॥ 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिःऋषिः।इन्द्रो विश्वे देवताः ईश्वरसभाध्यक्षौ या देवते । आर्च्युष्णिक् । ऋषभः ॥