Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 27

43 Mantra
5/27
Devata- यज्ञो देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- ब्राह्मी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
उद्दिव॑ꣳ स्तभा॒नान्तरि॑क्षं पृण॒ दृꣳह॑स्व पृथि॒व्यां द्यु॑ता॒नस्त्वा॑ मारु॒तो मि॑नोतु मि॒त्रावरु॑णौ ध्रु॒वेण॒ धर्म॑णा। ब्र॒ह्म॒वनि॑ क्षत्र॒वनि॑ रायस्पोष॒वनि॒ पर्यू॑हामि। ब्रह्म॑ दृꣳह क्ष॒त्रं दृ॒ꣳहायु॑र्दृꣳह प्र॒जां दृ॑ꣳह॥२७॥

उत्। दिव॑म्। स्त॒भा॒न॒। आ। अ॒न्तरि॑क्षम्। पृ॒ण॒। दृꣳह॑स्व। पृ॒थि॒व्याम्। द्यु॒ता॒नः। त्वा॒। मा॒रु॒तः। मि॒नो॒तु॒। मि॒त्राव॑रुणौ। ध्रु॒वेण॑। धर्म॑णा। ब्र॒ह्म॒वनीति॑ ब्रह्म॒ऽवनि॑। त्वा॒। क्ष॒त्र॒वनीति॑ क्षत्र॒ऽवनि॑। रा॒य॒स्पो॒ष॒वनीति॑ रायस्पोष॒ऽवनि॑। परि॑। ऊ॒हा॒मि॒। ब्रह्म॑। दृ॒ꣳह॒। क्ष॒त्रम्। दृ॒ꣳह॒। आयुः॑। दृ॒ꣳह॒। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। दृ॒ꣳह॒॑ ॥२७॥

Mantra without Swara
उद्दिवँ स्तभानान्तरिक्षम्पृण दृँहस्व पृथिव्यान्द्युतानास्त्वा मारुतो मिनोतु मित्रावरुणौ धु्रवेण धर्मणा । ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि त्वा रायस्पोषवनि पर्यूहामि । ब्रह्म दृँह क्षत्रन्दृँहायुर्दृँह प्रजान्दृँह ॥

उत्। दिवम्। स्तभान। आ। अन्तरिक्षम्। पृण। दृꣳहस्व। पृथिव्याम्। द्युतानः। त्वा। मारुतः। मिनोतु। मित्रावरुणौ। ध्रुवेण। धर्मणा। ब्रह्मवनीति ब्रह्मऽवनि। त्वा। क्षत्रवनीति क्षत्रऽवनि। रायस्पोषवनीति रायस्पोषऽवनि। परि। ऊहामि। ब्रह्म। दृꣳह। क्षत्रम्। दृꣳह। आयुः। दृꣳह। प्रजामिति प्रऽजाम्। दृꣳह॥२७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ( दिवम् ) धौलोक या प्रकाशमान पिडों को या प्रकाश को जिस प्रकार सूर्य उठा रहा है। उस प्रकार तू भी ( उत् स्तभान ) प्रकाश या ज्ञान और उत्तम पुरुषों को ऊपर स्थापित कर । ( अन्तरिक्षम्- पृण) अन्तरिक्ष को जिस प्रकार वायु पूरी कर रहा है उसी प्रकार अन्त रिक्ष को या मध्यम श्रेणी के लोगों को पूर्ण कर या पालन कर । और तू ( पृथिव्याम् ) इस पृथिवी पर (द्वंहस्व ) राष्ट्र की वृद्धि कर । ( द्युतान: ) देदीप्यमान, तेजस्वी पुरुष ( मारुतः ) वायु के समान प्रवल होकर (त्वा) तुझको ( मिनोतु ) संचालित करे । ( मित्रावरुणौ ) मित्र न्यायकर्ता और वरुण, दुष्टों का वारक दोनों अधिकारी जन भी ( ध्रुवेण धर्मणा ) अपने ध्रुव, स्थायी, सामर्थ्य से ( त्वा मिनुताम् ) तुझे सञ्चालित करें। (त्वा) तुझकों (ब्रह्मवनि ) ब्रह्म, ब्राह्मणों का पोषक, ( क्षत्रवनि क्षात्रबलत्र का पोषक ( रायस्पोषवनि ) धनों के, ऐश्वयों को पुष्ट के करने वाला ( पर्यूहामि ) जानता हूं, एवं नियत करता हूं । तू (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञान और विद्या बल को ( दृंह ) बढ़ा । ( चत्रं दृंह ) क्षात्रबल को व वीर्य को बढ़ा । ( आयु: दृंह) आयु को बढ़ा । ( प्रजाम् दृंह ) प्रजा की वृद्धि कर।।
Subject
( १ ) ( देवस्य त्वा००अपि कृन्तामि ) व्याख्या देखो अ० ५ ।म० २२ ॥ ( २ ) हे राजन् तू ( यव: असि ) तू हमारे शत्रुओं को दूर करने में समर्थ है। छातः तू 'यव' है। तू. ( अस्मत ) हम से ( द्वेषः ) द्वेष करनेवालों को या ईर्पादि दोषों को ( यवय ) दूर कर । और ( अरातीः ) शत्रुओं को जो हमें कर नहीं देते हैं उनको भी ( यवय ) दूर कर । (पितृष- दनाः ) पिता पालक, ज्ञानी पुरुषों के पदों पर विराजमान देश के पालक ( लोका: ) समस्त लोक प्रजाजन हे राजन् ! त्वा) तुझे ( दिवे ) द्यौलोक मैं सूर्य के समान स्थापन करने के लिये ( अन्तरिक्षाय ) अन्तरिक्ष में वायु के समान और ( पृथिव्यै ) पृथिवी के हित के लिये ( शुन्धताम् ) शुद्ध करें, अभिषेक करें | तू स्वयं ( पितृषदनम् असि ) समस्त प्रजा के पालक पुरुषों का आश्रय है ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
 प्रजापतिःऋषिः।औदुम्बरी यज्ञो वा देवता । ब्राह्मी जगती छन्दः । निषादः स्वरः ॥