Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 15

43 Mantra
5/15
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒दं विष्णु॒र्विच॑क्रमे त्रे॒धा निद॑धे प॒दम्। समू॑ढमस्य पासु॒रे स्वाहा॑॥१५॥

इ॒दम्। विष्णुः॑। वि। च॒क्र॒मे॒। त्रे॒धा। नि। द॒धे॒। प॒दम् ॥ समू॑ढ॒मिति॒ सम्ऽऊ॑ढम्। अ॒स्य॒। पा॒सु॒रे। स्वाहा॑ ॥१५॥

Mantra without Swara
इदँविष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पाँसुरे स्वाहा ॥

इदम्। विष्णुः। वि। चक्रमे। त्रेधा। नि। दधे। पदम्॥ समूढमिति सम्ऽऊढम्। अस्य। पासुरे। स्वाहा॥१५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( विष्णुः ) चर और अचर समस्त जगत् में व्यापक परमेश्वर ( इदं ) इस समस्त जगत् को ( विचक्रमे ) विविध रूपों में व्याप्त होकर रचता है और उसने ( त्रेधा ) तीन प्रकार से इसमें ( पदम् ) अपने ज्ञान या स्वरूप को ( निदधे ) स्थापित किया है । और ( पांसुरे ) जिस प्रकार धूलिमय देश में कोई पदार्थ लुप्त रहता है और बड़ा यन्त्र करने पर ढूंढने से प्राप्त होता है उसी प्रकार ( अस्य पदम् ) उसका वह गृढ़ स्वरूप भी ( समूढ्म् ) खूब गूढ है, सर्वत्र व्यापक है, और मनन निदिध्यासन द्वारा जानने योग्य है । ( स्वाहा ) उसका उत्तम रीति से ज्ञान करो और उसकी उपासना करो || 
सत्व, रजस्, तमस् इन तीनों रूपों में परमेश्वर अपनी सर्वत्र शक्ति प्रकट करता है और चतुर्थ निर्गुण रूप भी प्रकृति के परमाणुओं के भीतर ही खूब सूक्ष्म रूप में व्यापक है । [ विशेष विवेचना देखो साम-भाव्य ० पृ० ७५६ ] ॥
Subject
परमेश्वर की महान् शक्ति ।
Footenote
 १५ - 'समूश्र्म०' इति काण्व० ॥ 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिःऋषिः।मेधातिथिर्ऋषिः । विष्णुर्देवता । भुरिगार्षी गायत्री । षड्जः ॥