Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 40 / Mantra 15

17 Mantra
40/15
Devata- आत्मा देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वा॒युरनि॑लम॒मृत॒मथे॒दं भस्मा॑न्त॒ꣳ शरी॑रम्।ओ३म् क्रतो॑ स्मर। क्लि॒बे स्म॑र। कृ॒तꣳ स्म॑र॥१५॥

वा॒युः। अनि॑लम्। अ॒मृत॑म्। अथ॑। इ॒दम्। भस्मा॑न्त॒मिति॒ भस्म॑ऽअन्तम्। शरी॑रम् ॥ ओ३म्। क्रतो॒ इति॒ क्रतो॑। स्म॒र॒। क्लि॒बे। स्म॒र॒। कृ॒तम्। स्म॒र॒ ॥१५ ॥

Mantra without Swara
वायुरनिलममृतमथेदम्भस्मान्तँ शरीरम् । ओ३म् । क्रतो स्मर । क्लिबे स्मर । कृतँ स्मर ॥

वायुः। अनिलम्। अमृतम्। अथ। इदम्। भस्मान्तमिति भस्मऽअन्तम्। शरीरम्॥ ओ३म्। क्रतो इति क्रतो। स्मर। क्लिबे। स्मर। कृतम्। स्मर॥१५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( वायुः ) वायु, प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, धनंजय आदि ( अनिलम् ) उक्त प्राणों के मूलकारण, वायु तत्व और ( अमृतम् ) अमृत आत्मा यह एक दूसरे के आश्रित हैं। वायु के आश्रय प्राण, प्राणों के आश्रय आत्मा जीवन धारण करता है । (अथ) और पश्चात् (इदम्) यह शरीर ( भस्मान्तम् ) राख हो जाने तक ही है । इसलिये हे (क्रतो) कर्म के कर्त्ता जीव ! और प्रज्ञावान् पुरुष ! अथवा हे संकल्पमय जीव ! तू ( ओ३म् स्मर ) ओं३कार का स्मरण कर | ‘ओ३म्' परमेश्वर का सर्वश्रेष्ठ नाम है और (क्लिवे) अपने भरसक सामर्थ्य और प्रयत्न से साधे हुए लोक की प्राप्ति के लिये (स्मर) अपने अभीष्ट का स्मरण कर । (कृतं स्मर) अपने किये हुए अच्छे बुरे कर्मों का स्मरण कर ।
Subject
देह और भौतिक जीवन की वास्तविकता । अन्त समय में 'ओ३म् ' प्रभु का स्मरण ।