Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 40 / Mantra 11

17 Mantra
40/11
Devata- आत्मा देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सम्भू॑तिं च विना॒शं च॒ यस्तद्वेदो॒भय॑ꣳ स॒ह।वि॒ना॒शेन॑ मृ॒त्युं ती॒र्त्वा सम्भू॑त्या॒मृत॑मश्नुते॥११॥

सम्भू॑ति॒मिति॒ सम्ऽभू॑तिम्। च॒। वि॒ना॒शमिति॑ विऽना॒शम्। च॒। यः। तत्। वेद॑। उ॒भय॑म्। स॒ह ॥ वि॒ना॒शेनेति॑ विना॒शेन॑। मृ॒त्युम्। ती॒र्त्वा। सम्भू॒त्येति॒ सम्ऽभू॑त्या। अ॒मृत॑म्। अ॒श्नु॒ते॒ ॥११ ॥

Mantra without Swara
सम्भूतिञ्च विनाशञ्च यस्तद्वेदोभयँ सह । विनाशेन मृत्युन्तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते ॥

सम्भूतिमिति सम्ऽभूतिम्। च। विनाशमिति विऽनाशम्। च। यः। तत्। वेद। उभयम्। सह॥ विनाशेनेति विनाशेन। मृत्युम्। तीर्त्वा। सम्भूत्येति सम्ऽभूत्या। अमृतम्। अश्नुते॥११॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( संभूतिम् ) जिसमें नाना पदार्थ उत्पन्न होते हैं इस कार्य सृष्टि और ( विनाशं च ) जिसमें विनाश अर्थात् कारण में लीन होते हैं (उभयम् ) दोनों को (यः) जो (सह) एक साथ (वेद) जान लेता है । वह (विनाशेन ) सबके अदृश्य होने के परम कारण को जान कर (मृत्युम् ) देह को छोड़ने के धर्म के भय को (तीर्खा) पार करके, उसको सर्वथा त्याग कर (संभूत्या) कारण से कार्यों के उत्पन्न होने के तत्व को जान कर ( अमृतम् ) उस अमर अविनाशी मोक्ष को (अश्नुते ) प्राप्त करता है । संभूतिः = सम्भवैकहेतुः परं ब्रह्म । विनाशः = विनाशधर्मं कं शरीरमिति उवट।
Subject
सम्भूति और विनाश दोनों का ज्ञान । उन दोनों की उपासना का फल, मृत्यु, मरण और अमृत भोग ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
आत्मा । अनुष्टुप् । गांधारः ॥