Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 32

37 Mantra
4/32
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सूर्य॑स्य॒ चक्षु॒रारो॑हा॒ग्नेर॒क्ष्णः क॒नीन॑कम्। यत्रैत॑शेभि॒रीय॑से॒ भ्राज॑मानो विप॒श्चिता॑॥३२॥

सूर्य्य॑स्य। चक्षुः॑। आ। रो॒ह॒। अ॒ग्नेः। अ॒क्ष्णः। क॒नीन॑कम्। यत्र॑। एत॑शेभिः। ईय॑से। भ्राज॑मानः। वि॒प॒श्चितेति॑ विपः॒ऽचिता॑ ॥३२॥

Mantra without Swara
सूर्यस्य चक्षुरारोहाग्नेरक्ष्णः कनीनकम् । यत्रैत्रशेभिरीयसे भ्राजमानो विपश्चिता ॥

सूर्य्यस्य। चक्षुः। आ। रोह। अग्नेः। अक्ष्णः। कनीनकम्। यत्र। एतशेभिः। ईयसे। भ्राजमानः। विपश्चितेति विपःऽचिता॥३२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! तू ( यत्र ) जहां कहीं भी ( विपश्चिता ) विद्वान् पुरुषों के साथ अपने ( एतशेभिः ईयसे ) घोड़ों से जाय वहां ही तू ( सूर्यस्य [ प्रकाश इव ] ) सूर्य के प्रकाश के समान लोगों की आंखों पर ( आरोह ) चढ़ा रह, उनको शक्ति देकर उन पर अनुग्रह कर। और रात्रि के समय (अग्नेः [प्रकाश इव ] ) अग्नि के प्रकाश के समान ( अक्ष्णः कनीनकम् आरोह) लोगों की आंख की पुतली पर चढ़, अर्थात् अन्धकार में आंख जिस प्रकार सदा चमकती आग या दीपक पर ही जाती है उसी प्रकार लोगों की आंखों की पुतली तेरी ओर ही लगी रहे, अर्थात् तू उनकी आंखों पर लक्ष्य के समान बना रह। प्रजाओं को अन्धकार में भी प्रकाश दे और मार्ग दर्शा || 
ईश्वर पक्ष में ( यत्र ) जहां और जब भी ( एतशैः ) व्यापकता, सर्वज्ञत्वादि गुणों से ( भ्राजमानः ) देदीप्यमान होकर ( विपश्चिता ) विद्वान् पुरुष द्वारा ( ईयसे ) बतलाया जाता है। वहां और उसी समय तू हे ईश्वर ! ( सूर्यस्य चक्षुः आरोह, अग्नेः कनीनकं आरोह ) दिन में सूर्य के प्रकाश के समान और रात्रि में अग्नि के प्रकाश के समान चक्षु और आंख की पुतली पर चढ़ते हो और उन पर अपना अधिकार करते हो अर्थात् तुम्हीं उनको ज्ञान मार्ग दिखाते हो। इसी प्रकार मुख्य प्राण अपने जीवन प्रदाता आदि गुणों से ज्ञापित होकर हमें मार्ग दिखाती है, प्रकाश देती है ॥ 
 
Subject
राजा को सर्वप्रिय होने का उपदेश ।
Footenote
३२ -- `०कनीनकाम् ।`  इति काण्व० ॥
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । निचृदार्ष्यनुष्टुप् । गांधारः ॥