Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 30

37 Mantra
4/30
Devata- वरुणो देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- स्वराट् याजुषी त्रिष्टुप्,आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अदि॑त्या॒स्त्वग॒स्यदि॑त्यै॒ सद॒ऽआसी॑द। अस्त॑भ्ना॒द् द्यां वृ॑ष॒भोऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ममि॑मीत वरि॒माण॑म्पृथि॒व्याः। आसी॑द॒द्विश्वा॒ भुव॑नानि स॒म्राड् विश्वेत्तानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑॥३०॥

अदि॑त्याः। त्वक्। अ॒सि॒। अदि॑त्यै। सदः॑। आ। सी॒द॒। अस्त॑भ्नात्। द्याम्। वृ॒ष॒भः। अ॒न्तरिक्ष॑म्। अमि॑मीत। व॒रि॒माण॑म्। पृ॒थि॒व्याः। आ। अ॒सी॒द॒त्। विश्वा॑। भुव॑नानि। स॒म्राडिति॑ स॒म्ऽराट्। विश्वा॑। इत्। तानि॑। वरु॑णस्य। व्र॒तानि॑ ॥३०॥

Mantra without Swara
अदित्यास्त्वगसि अदित्यै सद आ सीद । अस्तभ्नाद्द्याँ वृषभो अन्तरिक्षममिमीत वरिमाणम्पृथिव्याः । आसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राड्विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि ॥

अदित्याः। त्वक्। असि। अदित्यै। सदः। आ। सीद। अस्तभ्नात्। द्याम्। वृषभः। अन्तरिक्षम्। अमिमीत। वरिमाणम्। पृथिव्याः। आ। असीदत्। विश्वा। भुवनानि। सम्राडिति सम्ऽराट्। विश्वा। इत्। तानि। वरुणस्य। व्रतानि॥३०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
-हे राजन् ! तू ( अदित्याः ) अदिति पृथिवीस्थ प्रजा का ( त्वग् असि ) त्वचा के समान उसका रक्षक है। तू ( अदित्यै) अदिति पृथिवी के लिये (सदः ) गृह के समान शरण होकर ( आसीद ) विराज । ( वृषभः) वर्षणशील मेघ या सूर्य जिस प्रकार ( द्याम् अस्तभ्नात् )द्यौलोक को धारण करता है और ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष को भी व्याप्त करता है उसी प्रकार हे राजन् ! तू भी  ( वृषभः ) सर्वश्रेष्ठ प्रजा पर उनके काम्य सुखों की वर्षा करने वाला होकर राजा (द्याम् अन्तरिक्षम् अस्तभ्नात् ) द्यौ, आकाश और अन्तरिक्ष और उसमें होने वाले ऐश्वर्यों को अपने हस्तगत करे। और वही ( पृथिव्याः परिमाणम् ) पृथिवी के विशाल परिमाण को भी ( अमिमीत ) स्वयं मापले, उसका पूरा ज्ञान रखे। वही ( सम्राड् ) महाराजाओं का महाराजा, सम्राट् होकर ( विश्वा भुवनानि ) समस्त भुवनों पर ( आसीदत् ) अधिष्ठाता होकर रहे, उन पर अधिकार करे । ( वरुणस्य ) सर्वश्रेष्ठ राजा के ( तानि ) यही ( विश्वा ) सब नाना प्रकार के ( व्रतानि ) कर्तव्य है । 
ईश्वर के पक्ष में- हे ईश्वर ! तू पृथ्वी का रक्षक है, द्यौ और अन्तरिक्ष में व्यापक उसको थामने वाला है । पृथिवी के विस्तार को जानता है । अन्तरिक्ष में समस्त भुवनों को स्थापित करता है। ये सब महान् कार्य उस परमेश्वर के ही हैं, दूसरे के नहीं ॥
सूर्य-वायु के पक्ष में - वायु पृथ्वी का आवरण है । उसका घर सा है । सूर्य, द्यौ अन्तरिक्षस्थ पिण्डों को थामता और पृथ्वी को प्रकाशित करता है । सब भुवनों को स्थापित करता है । यही महान् परमेश्वर के महान कार्य हैं ।
 
 
Subject
राजा के रक्षा आदि कर्तव्य ।
Footenote
 ३० अग्निदेवता । द० । आमृषभो इति काण्व० ॥ १ आदित्या। २ आसीद।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
कृष्णाजिनः सोमो वरुणश्च देवताः । ( १ ) स्वराड् याजुषी त्रिष्टुप् ,
 (२ ) विराडार्षी त्रिष्टुप् छन्द; ॥