Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 19

37 Mantra
4/19
Devata- वाग्विद्युतौ देवते Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- निचृत् ब्राह्मी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
चिद॑सि म॒नासि॒ धीर॑सि॒ दक्षि॑णासि क्ष॒त्रिया॑सि य॒ज्ञिया॒स्यदि॑तिरस्युभयतःशी॒र्ष्णी। सा नः॒ सुप्रा॑ची॒ सुप्र॑तीच्येधि मि॒त्रस्त्वा॑ प॒दि ब॑ध्नीतां पू॒षाऽध्व॑नस्पा॒त्विन्द्रा॒याध्य॑क्षाय॥१९॥

चित्। अ॒सि॒। म॒ना। अ॒सि॒। धीः। अ॒सि॒। दक्षि॑णा। अ॒सि॒। क्ष॒त्रिया॑। अ॒सि॒। य॒ज्ञिया॑। अ॒सि॒। अदि॑तिः। अ॒सि॒। उ॒भ॒य॒तः॒शी॒र्ष्णीत्यु॑भयतःऽशी॒र्ष्णी। सा। नः॒ सुप्रा॒चीति॒ सुऽप्रा॑ची। सुप्र॑ती॒चीति॒ सुऽप्र॑तीची। ए॒धि॒। मि॒त्रः॒। त्वा॒। प॒दि। ब॒ध्नी॒ता॒म्। पू॒षा। अध्व॑नः। पा॒तु॒। इन्द्रा॑य। अध्य॑क्षा॒येत्यधि॑ऽअक्षाय ॥१९॥

Mantra without Swara
चिदसि मनासि धीरसि दक्षिणासि क्षत्रियासि यज्ञियास्यदितिरस्युभयतःशीर्ष्णी । सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधि मित्रस्त्वा पदि बध्नीताम्पूषाध्वनस्पात्विन्द्रायाधक्षाय ॥

चित्। असि। मना। असि। धीः। असि। दक्षिणा। असि। क्षत्रिया। असि। यज्ञिया। असि। अदितिः। असि। उभयतःशीर्ष्णीत्युभयतःऽशीर्ष्णी। सा। नः सुप्राचीति सुऽप्राची। सुप्रतीचीति सुऽप्रतीची। एधि। मित्रः। त्वा। पदि। बध्नीताम्। पूषा। अध्वनः। पातु। इन्द्राय। अध्यक्षायेत्यधिऽअक्षाय॥१९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे वाक्शक्ते ! तू ( चित् असि ) शरीर की चेतना है । (मनः असि ) तू मननकारिणी, संकल्प विकल्प करने वाली, पदार्थों का ज्ञान करने वाली है । ( धीः असि ) तू ध्यान करने वाली, ज्ञान के धारण करने वाली है । ( दक्षिणा असि ) बलकारिणी शक्ति है, यज्ञ में दक्षिणा के समान शरीर में बल का प्रदान करने वाली है । ( क्षत्रिया असि ) राष्ट्र में जिस प्रकार क्षात्रशक्ति है, उस प्रकार शरीर में चेतना है । ( यज्ञिया असि ) यज्ञ में जिस प्रकार दीप्तिमान अग्नि उपास्यदेव है, उसी प्रकार शरीर में समस्त प्राणों की उपास्य शक्ति यह चेतना है । ( अदिति: असि ) पृथ्वी जिस प्रकार अखण्ड भाव से सबका आश्रय है, उस प्रकार यह भी शरीर में अखड अविनाशी है जो शरीर के नाश होने पर भी नाश नहीं होती। (उभयतः शीर्ष्णी) जिस प्रकार प्रसव काल में गौ के गर्भ से बच्चा आधा बाहर आने पर आगे और पीछे दोनों ओर दो सिर वाली होजाने से वह 'उभयतः शीर्ष्णी' कहाती है उसी प्रकार यह चेतना भी ज्ञान प्रसव काल में उभयतः शीर्ष्णी है । उसका एक अंश बाहर पदार्थ का ज्ञान करता है और दूसरा अंश भीतर मनन करता है। या बाह्य पदार्थों और भीतरी सुख दुःख आदि दोनों का ज्ञान करती या बाह्य चक्षु इन्द्रिय आदि उसके एक मुख हैं और भीतरी इन्द्रिय मन उसका दूसरा मुख है। (सा) वह तू हे चितिशक्ते (नः) हमें ( सुप्राची ) उत्तम रीति से आगे आये पदार्थों पर जाने और उसका ग्रहण करने वाली और (सु प्रतीची ) उत्तम रीति से प्रत्येक, भीतरी आत्मतत्व तक पहुंचने वाली ( एधि ) है । मित्रः ) मित्र - तेरा प्रेमी, स्नेही प्राण जैसे गाय को पैरों से बांधते हैं, उसी प्रकार ( त्वां ) तुझे ( पदि ) ज्ञान साधन में बांधे अथवा ( मित्रः स्नेह आत्मा तुझे ( पदि ) ज्ञेय, ध्येय पदार्थ या ज्ञानमय ब्रह्म में ( बध्नीताम् ) लगावे और (पूषा) पुष्टिकारक प्राण ही ( इन्द्राय अध्यक्षाय ) उसके ऊपर अध्यक्ष रूप से विद्यमान इन्द्र-आत्मा के स्वरूप की प्राप्ति या ज्ञान करने के लिये ( अध्वनः ) उस तक पहुंचने वाले योग या ज्ञान मार्ग से उसकी ( पातु ) रक्षा करे । अर्थात् प्राणायाम के बल पर उस चितिशक्ति के ध्येय विषय पर बांधे और उसको विचलित होने से बचावे ।
विद्युत् पक्ष में- वह (चित् ) आकर्षण शक्ति से पदार्थों को मिलाने वाली ( मनःअसि ) स्तब्ध करने वाली ( दक्षिणा ) बलवती, ( क्षत्रिया ) 
आघात करने वाली ( यज्ञिया ) परस्पर मिलाने वाली, रसायन योग उत्पन्न करने वाली, ( उभयतः शीर्ष्णी) Positive and Negative धन और ऋण नामक दो सिरों वाली, वह ( सुप्राची ) उत्तम प्रकाश करने वाली, ( सुप्रतीची ) समान जाति की विद्युत् से परे हटने वाली, (मित्रः ) रसायन भोगों का मेलक पुरुष उसे ( पदि ) आश्रयस्थान, विद्युत् घंटी आदि में बद्ध करे । ( पूषा ) पोषक, उसकी शक्ति को बढ़ाने वाला, मार्ग में विलीन होने से दुर्वाहक लेपों द्वारा सुरक्षित रक्खे । जिससे ( अध्यक्षाय इन्द्राय ) मुख्य ऐश्वर्यवान् राजा के या बलकारी यन्त्र के समस्त कार्य सिद्ध हों। राजा की राष्ट्रशक्ति भी संचयकारिणी, स्तम्भनकारिणी, राष्ट्रधारिणी, बलवती क्षात्रबल से युक्त है, मित्र राजा उसकी व्यवस्था करें पूषा अधिकारी, इन्द्र राजा के लिये उसकी मार्गों पर रक्षा करे । शत्रुगण विशेष मार्गों से आक्रमण न करें ॥ शत० ३ । २ । ४ । १५-१० ॥
Subject
वाणी का वर्णन।
Footenote
 १९- (उ०) सुप्रतीची भव' इति काण्व० ॥
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वाग् विद्युद्रूप सोमक्रयणी च देवता । भुरिग् ब्राह्मी पंक्तिः । पञ्चमः स्वरः ॥