Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 14

37 Mantra
4/14
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषयः Chhand- स्वराट् आर्षी उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॒ त्वꣳ सु जा॑गृहि व॒यꣳ सु म॑न्दिषीमहि। रक्षा॑ णो॒ऽअप्र॑युच्छन् प्र॒बुधे॑ नः॒ पुन॑स्कृधि॥१४॥

अग्ने॑। त्वम्। सु। जा॒गृ॒हि॒। व॒यम्। सु। म॒न्दि॒षी॒म॒हि॒। रक्ष॑। नः॒। अप्र॑युच्छ॒न्नित्यप्र॑ऽयुच्छन्। प्र॒बुध॒ इति॑ प्र॒ऽबुधे॑। न॒। पु॒न॒रिति॒ पुनः॑। कृ॒धि॒ ॥१४॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वँ सु जागृहि वयँ सु मन्दिषीमहि । रक्षा णो अप्रयुच्छन्प्रबुधे नः पुनस्कृधि ॥

अग्ने। त्वम्। सु। जागृहि। वयम्। सु। मन्दिषीमहि। रक्ष। नः। अप्रयुच्छन्नित्यप्रऽयुच्छन्। प्रबुध इति प्रऽबुधे। न। पुनरिति पुनः। कृधि॥१४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) शत्रुसंतापक अग्ने ! राजन् ! ( त्वं ) तू (सु) भली प्रकार ( जागृहि ) जाग, प्रमाद रहित रह कर पहरा दे । ( वयं ) हम (सु) अच्छी प्रकार निश्चिन्त होकर ( मन्दिषीमहि ) सोवें । ( नः ) हमारी ( अप्रयुच्छन् ) प्रमाद रहित होकर ( रक्तः ) रक्षा कर ( पुनः ) और फिर हमें (प्रबुधे ) जाग़ृत दशा में (कृधि) करदे, जगाये ॥ 
ईश्वर पक्ष में - हे ईश्वर तू बराबर जागता है, हम अविद्या में सोते हैं । तू बेचूक हमारी रक्षा कर, हमें पुनः प्रबोध, सत्य ज्ञान के लिये चैतन्य कर । प्राण के पक्ष में- हम समस्त इन्द्रियाँ सोती हैं, प्राण जागता है वह हमारी रक्षा करता है, पुनः निद्रा के बाद हमें चैतन्य करता है ॥ शत० ३।२।२ । २२ ।। 
Subject
राजा को सावधान होने का उपदेश ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निदेवता । स्वराडार्च्युष्णिक् । ऋषभः ॥