Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 39 / Mantra 7

13 Mantra
39/7
Devata- मरुतो देवताः Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒ग्रश्च॑ भी॒मश्च॒ ध्वान्तश्च॒ धुनि॑श्च।सा॒स॒ह्वाँश्चा॑भियु॒ग्वा च॑ वि॒क्षिपः॒ स्वाहा॑॥७॥

उ॒ग्रः। च॒। भी॒मः। च॒। ध्वा᳖न्त॒ इति॒ धुऽआ॑न्तः। च॒। धुनिः॑। च॒ ॥ सा॒स॒ह्वान्। स॒स॒ह्वानिति॑ सस॒ह्वान्। च॒। अ॒भि॒यु॒ग्वेत्य॑भिऽयु॒ग्वा। च॒। वि॒क्षिप॒ इति॑ वि॒क्षिपः॑। स्वाहा॑ ॥७ ॥

Mantra without Swara
उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च । सासह्वाँश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा ॥

उग्रः। च। भीमः। च। ध्वान्त इति धुऽआन्तः। च। धुनिः। च॥ सासह्वान्। ससह्वानिति ससह्वान्। च। अभियुग्वेत्यभिऽयुग्वा। च। विक्षिप इति विक्षिपः। स्वाहा॥७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
वह राजा (उग्रः च) भयंकर और सदा वायु के समान प्रचण्ड वेग से शत्रु पर आक्रमण करने से 'उग्र' है । (भीमः च) उनको भयप्रद होने से 'भीम' है । (ध्वान्तः च) अन्धकार के समान मूढ़ कर देने वाला होने से 'ध्वान्त' है । (धुनिः च) कंपा देने वाला होने से 'धुनि' है । (सासद्दान् च) बराबर पराजित करने में समर्थ होने से 'सासह्नान् ' है । ( अभियुग्वा ) उन पर आक्रमण करने से 'अभियुग्वा' है और उनको तितर बितर कर देने से 'विक्षिप' है । (स्वाहा) वह अपने ही उत्तम कर्मों के कारण उन नामों से मान पाने योग्य है । ( २ ) जीवपक्ष में- जीव, तीव्र स्वभाव, भयंकर तामस, कम्पमान, सहनशील, आसक्त विक्षिप्त और [चकारसे] शान्त, निर्भय, प्रकाशमान, स्थिर, असहनशील, विक्षिप्त आदि अपने कर्मफलों से हो जाता है ।
Subject
प्रजापति प्रभु और परमेश्वर के नाना गुण कर्म स्वभावानुसार नाना नाम ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
मरुतः । भुरिंग गायत्रा । षड्जः ॥