Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 7

28 Mantra
38/7
Devata- वातो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- अष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स॒मु॒द्राय त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑। सरि॒राय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑।अ॒ना॒धृ॒ष्याय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑। अ॒प्र॒ति॒धृ॒ष्याय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑।अ॒व॒स्यवे॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑। अ॒शि॒मि॒दाय॑ त्वा॒ वाता॑य॒ स्वाहा॑॥७॥

स॒मुद्राय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। स॒रि॒राय॑। त्वा॒। वाता॑य॒। स्वाहा॑। अ॒ना॒धृष्याय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। अ॒प्र॒ति॒धृ॒ष्यायेत्य॑प्रति॑ऽधृ॒ष्याय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। अ॒व॒स्यवे॑ त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑। अ॒शि॒मि॒दायेत्य॑शिमि॒ऽदाय॑। त्वा॒। वाता॑य। स्वाहा॑ ॥७ ॥

Mantra without Swara
समुद्राय त्वा वाताय स्वाहा सरिराय त्वा वाताय स्वाहा । अनाधृष्याय त्वा वाताय स्वाहा प्रतिधृष्याय त्वा वाताय स्वाहा । अवस्यवे त्वा वाताय स्वाहाशिमिदाय त्वा वाताय स्वाहा ॥

समुद्राय। त्वा। वाताय। स्वाहा। सरिराय। त्वा। वाताय। स्वाहा। अनाधृष्याय। त्वा। वाताय। स्वाहा। अप्रतिधृष्यायेत्यप्रतिऽधृष्याय। त्वा। वाताय। स्वाहा। अवस्यवे त्वा। वाताय। स्वाहा। अशिमिदायेत्यशिमिऽदाय। त्वा। वाताय। स्वाहा॥७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(१) मैं प्रजावर्ग (त्वा) तुझ राजा विद्वान् पुरुष को (वाताय ) प्राण वायु के समान, (समुद्राय ) समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाले समुद्र' वा मेघादि से जलवर्षण करने वाले वायु के पद के लिये (स्वाहा) सत्य क्रिया से स्वीकार करता हूँ। (स्वा) तुझको (सरिराय वाताय ) समस्त प्राणियों में एक साथ और एक समान चेष्टा उत्पन्न करने वाले वायु के समान सर्वप्रेरक शासक पद के लिये (स्वाहा ) मैं शासक रूप से सत्य वाणी से स्वीकार करता हूँ । (अनाधृष्याय वाताय त्वां स्वाहा ) प्रबल बात या आंधी को कोई काबू नहीं कर सकता उसी प्रकार शत्रुओं से कभी न दबने वाले, प्रचण्ड पराक्रमी पद के लिये तुझे सत्य वाणी से स्वीकार करता हूँ। (त्वा अप्रतिघृष्याय वाताय स्वाहा ) प्रतिस्पर्धी द्वारा दमन न किये जा सकने वाले प्रचण्ड तेजस्वी पद के लिये तुझे सत्य वाणी से स्वीकार करता हूँ। (अवस्यवे वाताय त्वा स्वाहा) रक्षा करने वाले प्राण के समान विद्यमान रक्षक पद के लिये तुझको मैं सत्य क्रिया से स्वीकार करता हूँ । (अशिमिदाय वाताय त्वा स्वाहा ) अखण्ड शक्ति वाले वायु के समान अक्षत वीर्यवान् सामर्थ्यवान् पद के लिये तुझे स्वीकार करता हूँ ।
(२) स्त्री पुरुष पक्ष में- स्त्री के लिये पुरुष वायु के समान प्राणप्रद समुद्र के समान अनन्त, मेघवत् सुखपूर्वक अभिलाषाओं का प्रेरक पूरक, दूसरे से धर्षण योग्य न हो, प्रतिस्पर्धा में न दबे, रक्षण में कुशल हो । वायु के समान सुखजनक, सुशीतल, अदम्य, उत्साहवान्, प्राणप्रिय हो। इसी निमित्त स्त्री पुरुष को और पुरुष स्त्री को स्वीकार करें । वह अक्षत वीर्य, कर्म और सामर्थ्यवान् अथवा क्लेश कर्म को दूर करने वाला, 'अशिमिदाय' क्लेशात्मकं कर्म शिमि, तन्न ददाति इत्यशिमिदः तस्मै कुशविवर्जकायेति महीधरः । शिमीत कर्मनाम क्लेशात्मकं चैतत् अक्लेशदाय इति उवटः । शिमीति कर्मनाम शमयतेर्वा । इति यास्कः निरु० ५ । २ । ७ ॥ न शिमिं शान्ति यति खण्डयति इति अशिमिदः । न शिमि केशयुक्तं कर्म ददाति इति वा । शिमिः शक्तिः न दीयते खण्ड सोऽशिमिदः तस्मै । यदश्यते भुज्यते तदनं तन्मेदते यस्मिन् तस्मै रसा-. व्येति दया० ।
Subject
पृथ्वी स्त्री का समान वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वातनामानि । अष्टिः । मध्यमः ॥