Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 21

28 Mantra
38/21
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
घर्मै॒तत्ते॒ पुरी॑षं॒ तेन॒ वर्द्ध॑स्व॒ चा च॑ प्यायस्व।व॒र्द्धि॒षी॒महि॑ च॒ व॒यमा च॑ प्यासिषीमहि॥२१॥

घर्म॑। ए॒तत्। ते॒। पुरी॑षम्। तेन॑। वर्द्ध॑स्व। च॒। आ। च॒। प्या॒य॒स्व॒ ॥ व॒र्द्धि॒षी॒महि॑। च॒। व॒यम्। आ। च॒। प्या॒सि॒षी॒म॒हि॒ ॥२१ ॥

Mantra without Swara
घर्मैतत्ते पुरीषन्तेन वर्धस्व चा च प्यायस्व । वर्धिषीमहि च वयमा च प्यासिषीमहि ॥

घर्म। एतत्। ते। पुरीषम्। तेन। वर्द्धस्व। च। आ। च। प्यायस्व॥ वर्द्धिषीमहि। च। वयम्। आ। च। प्यासिषीमहि॥२१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (धर्म) मेघ के समान प्रजा पर सुख समृद्धि के वर्षक और सूर्य के समान तेजस्विन्! (ते) तेरा ( एतत् ) यह इतना बड़ा ( पुरीषम् ) ऐश्वर्य और राज्यपालन करने का सामर्थ्य है । तू (तेन ) उससे (वर्धस्व) बढ़ और (अध्यायस्व च ) खूब समृद्ध हो और प्रजा को भी पुष्ट कर । ( वयम् च ) हम भी (वर्धिषीमहि) बढ़े और (आ प्यासि - षीमहि) खूब लक्ष्मी से समृद्ध और तृप्त हों ।
Subject
सार पदार्थ ग्रहण करने का उपदेश ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
यज्ञः। अनुष्टुप् । गान्धारः ॥