Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 3

21 Mantra
37/3
Devata- द्यावापृथिव्यौ देवते Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- ब्राह्मी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
देवी॑ द्यावापृथिवी म॒खस्य॑ वाम॒द्य शिरो॑ राध्यासं देव॒यज॑ने पृथिव्याः।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे॥३॥

देवी॒ऽइति॒ देवी॑। द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ऽइति॑ द्यावापृथिवी। मखस्य॑। वा॒म्। अ॒द्य। शि॒रः॑। रा॒ध्या॒स॒म्। दे॒व॒यज॑न॒ इति॑ देव॒ऽयज॑ने। पृ॒थि॒व्याः ॥ मखाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे ॥३ ॥

Mantra without Swara
देवी द्यावापृथिवी मखस्य वामद्य शिरो राध्यासन्देवयजने पृथिव्याः । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

देवीऽइति देवी। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। मखस्य। वाम्। अद्य। शिरः। राध्यासम्। देवयजन इति देवऽयजने। पृथिव्याः॥ मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे॥३॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(देवी) दिव्य गुणों से युक्त ( द्यावापृथिवी) द्यौ और पृथिवी, सूर्य और भूमि के समान राजा प्रजावर्गो ! (वाम्) तुम दोनों के (मखस्य ) परस्पर त्रुटिरहित राज्यपालन रूप यज्ञ के (शिरः) सिर के समान मुख्य पुरुष को ( पृथिव्याः ) पृथिवीनिवासिनी प्रजा के (देवयजने) विद्वानों, राजगण और विजिगीष पुरुषों के यज्ञस्थान या एकत्र होने के स्थान में (राध्यासम्) प्राप्त करें । हे वीर पुरुष ! (त्वा) तुझको (मखाय ) त्रुटि- रहित राज्यपालनरूप यज्ञ के लिये नियुक्त करता हूँ । तुझे (मखस्य शीर्ष्ण), राष्ट्ररूप यज्ञ के शिर या मुख्य पद के लिये नियत करता हूँ ।
Subject
मुख्य शिरोमणी नायक की उत्पत्ति।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
दध्यङ् आथर्वणः । द्यावापृथिव्यौ । ब्राह्मी गायत्री । षड्जः ॥