Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 6

22 Mantra
35/6
Devata- यमो देवता Rishi- सड्कसुक ऋषिः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्र॒जाप॑तौ त्वा दे॒वता॑या॒मुपो॑दके लो॒के नि द॑धाम्यसौ।अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥६॥

प्र॒जाप॑ता॒विति॑ प्र॒जाऽप॑तौ। त्वा॒। दे॒वता॑याम्। उपो॑दक॒ इत्युप॑ऽउदके। लो॒के। नि। द॒धा॒मि॒। अ॒सौ॒ ॥ अप॑। नः॒। शोशु॑चत्। अ॒घम् ॥६ ॥

Mantra without Swara
प्रजापतौ त्वा देवतायामुपोदके लोके निदधाम्यसौ । अप नः शोशुचदघम् ॥

प्रजापताविति प्रजाऽपतौ। त्वा। देवतायाम्। उपोदक इत्युपऽउदके। लोके। नि। दधामि। असौ॥ अप। नः। शोशुचत्। अघम्॥६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (असौ) पुरुष प्रजाजन ! (त्वा ) तुझको मैं ( जापतौ ) प्रजा के पालक राजा के अधीन (उप-उदके लोके ) पानी के समीप स्थित प्रदेश में (निदधामि ) नियत रूप से स्थापित करता हूँ। वह प्रजापालक राजा ही (नः) हमारे (अघम् ) पापाचरण, परस्पर घात प्रतिघात आदि को (नः) हममें से ( अप शोशुचत् ) मल को अग्नि से जलाकर नष्ट कर देने के समान दूर कर शुद्ध करे । (२) हे जीव ! जलादि जीवनोपयोगी लोक में मैं तुझे स्थापित करता हूँ । उस परमेश्वर के अधीन तू रह, हमारे पापों को दग्ध करे, दूर करे ।
Subject
प्रजापति के कर्म
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिः । उष्णिक् । ऋषभः ॥