Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 4

22 Mantra
35/4
Devata- वायुसवितारौ देवते Rishi- आदित्या देवा वा ऋषयः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒श्व॒त्थे वो॑ नि॒षद॑नं प॒र्णे वो॑ वस॒तिष्कृ॒ता।गो॒भाज॒ऽइत्किला॑सथ॒ यत्स॒नव॑थ॒ पू॑रुषम्॥४॥

अ॒श्व॒त्थे। वः॒। नि॒षद॑नम्। नि॒सद॑न॒मिति॑ नि॒ऽसद॑नम्। प॒र्णे। वः॒। व॒स॒तिः। कृ॒ता ॥ गो॒भाज॒ इति॑ गो॒ऽभाजः॑। इ॒त्। किल॑। अ॒स॒थ॒। यत्। स॒नव॑थ। पूरु॑षम्। पुरु॑ष॒मिति॒ पुरु॑षम् ॥४ ॥

Mantra without Swara
अश्वत्थे वो निषदनम्पर्णे वो वसतिष्कृता । गोभाजऽइत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम् ॥

अश्वत्थे। वः। निषदनम्। निसदनमिति निऽसदनम्। पर्णे। वः। वसतिः। कृता॥ गोभाज इति गोऽभाजः। इत्। किल। असथ। यत्। सनवथ। पूरुषम्। पुरुषमिति पुरुषम्॥४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! क्योंकि ( वः ) आप लोगों का ( नि- सदनम् ) नियम में रहना ( अश्वत्थे ) अश्वारूढ़ सावधान, क्षत्रिय राजा के अधीन है और (वः वसतिः) आप लोगों का निवासस्थान भी (पर्णे) पालन करने हारे राजा के अधीन (कृतः ) किया गया है, अतः (यत्) जब ( पुरुषम् ) अपने गुरु या अध्यक्ष राजा को (सनवथ ) उसका भाग दे चुको तो आप लोग (गोभाजः) पृथिवी की उपज और वेद वाणी का सेवन करने वाले ( इत् ) ही होकर (किल) निश्चय से (असथ) रहो । व्याख्या देखो भ० ११।७९॥ (२) परमेश्वर के पक्ष में- हे जीवो ! तुम लोगों की स्थिति (अश्वत्थे) कल तक भी स्थिर न रहने वाले, अनित्य और (पर्णे) पत्ते के समान चञ्चल संसार में है । इसलिये (यत्) जब तुम ( पुरुषम् सनवथ ) परमेश्वर की उपासना करो तो (गोभाजः इकिल असथ) वेदवाणी, इन्द्रिय, किरण आदि का सेवन करने वाले ज्ञानवान्, भोगवान् होवो ।
Subject
प्रजाओं को आदेश । उत्पादक पिता और सविता के कर्म ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वायुः सविता च । अनुष्टुप् । गान्धारः ॥