Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 5

58 Mantra
34/5
Devata- मनो देवता Rishi- शिवसङ्कल्प ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्मि॒न्नृचः॒ साम॒ यजू॑षि॒ यस्मि॒न् प्रति॑ष्ठिता रथना॒भावि॑वा॒राः।यस्मिँ॑श्चि॒त्तꣳ सर्व॒मोतं॑ प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥५॥

यस्मि॑न्। ऋचः॑। साम॑। यजू॑षि। यस्मि॑न्। प्रति॑ष्ठि॑ता। प्रति॑स्थ॒तेति॒ प्रति॑ऽस्थिता। र॒थ॒ना॒भावि॒वेति॑ रथना॒भौऽइ॑व। अ॒राः ॥ यस्मि॑न्। चि॒त्तम्। सर्व॑म्। ओत॒मित्याऽउ॑तम्। प्र॒जाना॒मिति॑ प्र॒ऽजाना॑म्। तत्। मे॒। मनः॑। शि॒वस॑ङ्कल्प॒मिति॑ शि॒वऽस॑ङ्कल्पम्। अ॒स्तु ॥५ ॥

Mantra without Swara
यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतम्प्रजानान्तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥

यस्मिन्। ऋचः। साम। यजूषि। यस्मिन्। प्रतिष्ठिता। प्रतिस्थतेति प्रतिऽस्थिता। रथनाभाविवेति रथनाभौऽइव। अराः॥ यस्मिन्। चित्तम्। सर्वम्। ओतमित्याऽउतम्। प्रजानामिति प्रऽजानाम्। तत्। मे। मनः। शिवसङ्कल्पमिति शिवऽसङ्कल्पम्। अस्तु॥५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( रथनाभौ अराः इव) रथ के चक्र की नाभि में जिस प्रकार अरे लगे होते हैं उसी प्रकार ( यस्मिन् ) जिस मन में (ऋचः) ऋग्वेद के मन्त्र, (साम) सामवेद और (यजूंषि) यजुर्वेद के मन्त्र ( प्रतिष्ठिताः) स्थित हैं अर्थात् वेद आदि नाना विज्ञान पढ़ लेने पर स्मृति रूप से जिसमें रहते हैं और ( यस्मिन् ) जिसमें ( प्रजानाम् ) प्रजाओं, प्राणियों के ( सर्वम् चित्तम् ) समस्त चित्त, समस्त पदार्थों का ज्ञान भी ( ओतम् ) सूत्र में मणियों के समान और पट में सूत्रों के समान ओत प्रोत अर्थात् पिरोये हुए हैं (तत्) वह मेरा (मनः) मननशील अन्तःकरण और उससे युक्त आत्मा (शिवसंकल्पम् अस्तु ) शुभ वेद तथा परमेश्वर आदि के ज्ञान, पठन मनन आदि उत्तम विचार परम्परा से युक्त हो ।
Subject
शिवसंकल्पसूक्त ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
मनः । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥