Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 42

58 Mantra
34/42
Devata- पूषा देवता Rishi- ऋजिष्व ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प॒थस्प॑थः॒ परि॑पतिं वच॒स्या कामे॑न कृ॒तोऽअ॒भ्यानड॒र्कम्।स नो॑ रासच्छु॒रुध॑श्च॒न्द्राग्रा॒ धियं॑ धियꣳ सीषधाति॒ प्र पू॒षा॥४२॥

प॒थस्प॑थः। प॒थःऽप॑थः॒ इति॑ प॒थःऽप॑थः। परि॑पति॒मिति॒ परि॑ऽपति॒म्। व॒च॒स्या। कामे॑न। कृ॒तः। अ॒भि। आ॒न॒ट्। अ॒र्कम् ॥ सः। नः॒। रा॒स॒त्। शु॒रुधः॑। च॒न्द्राग्रा॒ इति॑ च॒न्द्रऽअ॑ग्राः ॥ धियां॑धिय॒मिति॒ धिय॑म्ऽधियम्। सी॒ष॒धा॒ति॒। सी॒स॒धा॒तीति॑ सीसधाति। प्र॒। पू॒षा ॥४२ ॥

Mantra without Swara
पथस्पथः परिपतिँवचस्या कामेन कृतोऽअभ्यानडर्कम् । स नो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा धियंधियँ सीषधाति प्र पूषा ॥

पथस्पथः। पथःऽपथः इति पथःऽपथः। परिपतिमिति परिऽपतिम्। वचस्या। कामेन। कृतः। अभि। आनट्। अर्कम्॥ सः। नः। रासत्। शुरुधः। चन्द्राग्रा इति चन्द्रऽअग्राः॥ धियांधियमिति धियम्ऽधियम्। सीषधाति। सीसधीतीति सीसधाति। प्र। पूषा॥४२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
जो (पूषा) सब प्रजाओं का पोषण पालन करने वाला राजा (वचस्या) वेदोक्त वचन और (कामेन) शुभ और प्रबल अभिलाषा से (कृतः ) निष्पन्न, दृढ़, होकर (पथः पथः परिपतिम् ) प्रत्येक धर्म मर्यादा और उत्तम मार्ग के सब प्रकार से पालक, (स्वामी) ( अर्कम् )स्तुति करने योग्य सूर्य के तेजस्वी पद को ( अभिनाडू) साक्षात् सबके सन्मुख प्राप्त है (सः) बह (नः) हमें (चन्द्राग्नाः) सुवर्णादि से सुभूषित समृद्ध (शुरुधः) शोक पीड़ादि के रोकने वाली सम्पदाएं (रासत् ) प्रदान करे और वह ही ( धियं धियम् ) प्रत्येक काम को ( प्र सीषधाति) उत्तम रीति से चलावे ।
अथवा — मैं (कामेन कृतः) प्रबल अभिलाषा से युक्त हो ( वचस्या) उत्तम वेद वचनों से (पथः पथः परिपतिं) प्रत्येक सन्मार्ग- मर्यादा के पालक ( अर्कम् अभ्यानडू ) पूजनीय परश्वमेर को साक्षात् प्राप्त होऊं । वह (चन्द्राग्राः) आह्लाद से भरी हुई (शुरुधः) शोकनाशनी उत्तम वाणियों को (रासत् ) हमें प्रदान करें। वह सर्वपोषक (धियं धियं प्र सीषधाति) हमारी बुद्धि और कर्म को अच्छे मार्ग पर चलावे ।
Subject
पूषा राजा और परमेश्वर ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋजिश्वा । पूषा । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥