Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 34

58 Mantra
34/34
Devata- अग्न्यादयो लिङगोक्ता देवताः Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृतज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्रा॒तर॒ग्निं प्रा॒तरिन्द्र॑ꣳ हवामहे प्रा॒तर्मि॒त्रावरु॑णा प्रा॒तर॒श्विना॑।प्रा॒तर्भगं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ प्रा॒तः सोम॑मु॒त रु॒द्रꣳ हु॑वेम॥३४॥

प्रा॒तः। अ॒ग्निम्। प्रा॒तः। इन्द्र॑म्। ह॒वा॒म॒हे॒। प्रा॒तः। मि॒त्रावरु॑णा। प्रा॒तः। अ॒श्विना॑ ॥ प्रा॒तः। भग॑म्। पू॒षण॑म्। ब्रह्म॑णः। पति॑म्। प्रा॒तरिति॑ प्रा॒तः। सोम॑म्। उ॒त। रु॒द्रम्। हु॒वे॒म॒ ॥३४ ॥

Mantra without Swara
प्रातरग्निम्प्रातरिन्द्रँ हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना । प्रातर्भगम्पूषणं ब्रह्मणस्पतिम्प्रातः सोममुत रुद्रँ हुवेम ॥

प्रातः। अग्निम्। प्रातः। इन्द्रम्। हवामहे। प्रातः। मित्रावरुणा। प्रातः। अश्विना॥ प्रातः। भगम्। पूषणम्। ब्रह्मणः। पतिम्। प्रातरिति प्रातः। सोमम्। उत। रुद्रम्। हुवेम॥३४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( प्रातः ) जब पांच घड़ी रात्रि रहे तब प्रभात वेला में, प्रात:- काल, हम लोग (अग्निं हनामहे) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर का स्मरण करें । ज्ञानवान् आचार्य को नमस्कार करें। ( प्रातः इन्द्रम् ) प्रातः काल में हम उस समस्त ऐश्वर्यों के दाता परमेश्वर का स्मरण करें और परम ऐश्वर्य को प्राप्त करें और ज्ञान के द्रष्टा आचार्य की उपासना करें। (प्रात: मित्रावरुणा हवामहे ) प्रात:काल ही हम मित्र अर्थात् प्राण के समान सबके स्नेहकारी, जीवनप्रद, प्रिय और वरुणं अर्थात् अपान के समान सर्व मलनाशक और शक्तिमान् परमेश्वर की उपासना करें । प्रातःकाल हम लोग प्राण और अपान की साधना प्राणायाम द्वारा करें। प्रातःकाल हम लोग मित्र, स्नेही और श्रेष्ठ पुरुष को नमस्कार आदि करें। (प्रात: अश्विना) माता पिता को प्रातः नमस्कार करें। सूर्य, द्यौ और पृथ्वी और दिन और रात्रि के उत्पादक परमेश्वर की भी प्रात: उपासना करें। (भगम) सबके सेवन करने योग्य, (पूषणम् ) सबके पोषक, ( ब्रह्मणस्पतिम् ) “वेद और ब्रह्माण्ड के पालक परमेश्वर और ब्रह्म, अन्न, बल, यश और ज्ञान के पालक विद्वान् तेजस्वी पुरुष की (प्रातः) प्रातःकाल, सब कार्यों से प्रथम, ( सोमम् ) सबके अन्तर्यामी प्रेरक, (उत) और ( रुद्रम् ) 'पापियों को रुलाने हारे, सर्वरोगनाशक, सर्वज्ञानोपदेशक परमेश्वर की उपासना करें और इसी प्रकार विद्वान्, रोगहारी वैद्य और ज्ञानी विद्वानों का संग भी प्रातः सर्व कार्यों के प्रथम करें। प्रातःकाल ही (सोम) सोम आदि औषधियों का सेवन और (रुद्र) जीव आत्मा का चिन्तन भी प्रात:- काल ही किया करें । महर्षि दयानन्द ।
Subject
प्रातः उपासना ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वसिष्ठ ऋषिः । अग्न्यादयो देवताः । निचृत् जगती । निषादः ॥