Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 33

58 Mantra
34/33
Devata- उषर्देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत परोष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उष॒स्तच्चि॒त्रमा भ॑रा॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवति।येन॑ तो॒कं च॒ तन॑यं च॒ धाम॑हे॥३३॥

उषः॑। तत्। चि॒त्रम्। आ। भ॒र॒। अ॒स्मभ्य॑म्। वा॒जि॒नी॒व॒तीति॑ वाजिनीऽवति ॥ येन॑। तो॒कम्। च॒। तन॑यम्। च॒। धाम॑हे ॥३३ ॥

Mantra without Swara
उषस्तच्चित्रमाभरास्मभ्यँवाजिनीवति । येन तोकञ्च तनयञ्च धामहे ॥

उषः। तत्। चित्रम्। आ। भर। अस्मभ्यम्। वाजिनीवतीति वाजिनीऽवति॥ येन। तोकम्। च। तनयम्। च। धामहे॥३३॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (वाजिनीवति) वाजिनी अर्थात् अश्व रथ आदि सेना से युक्त ( उष: ) शत्रुओं को दान करने वाली, उनका नाश करने वाली, दण्डशक्ते ! तु ( अस्मभ्यम् ) हमारे हित के लिये ( तत् ) उस नाना प्रकार के ( चित्रम् ) अद्भुत धन को (आ भर) प्राप्त करा (येन) जिससे हम लोग (तोकं च) दुःखों के नाशक पुत्रों और ( तनयं च ) सन्तति के विस्तार करने वाले पौत्र आदि को भी ( धामहे ) धारण करें । स्त्री के पक्ष मैं- ( वाजिनीवति उषः ) बल, वीर्य, ज्ञान, बल और अन्नादि से समृद्ध उषा के समान शोभा से युक्त स्त्री संग्रह करने योग्य धन को प्राप्त करे,पुत्र पौत्रों का धारण पोषण करे ।
Subject
रात्रि, उषा, राजशक्ति और स्त्री ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
गोतमः ऋषिः । उषो देवता । निचृत् परोष्णिक् । ऋषभः ॥