Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 30

58 Mantra
34/30
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
द्युभि॑र॒क्तुभिः॒ परि॑ पातम॒स्मानरि॑ष्टेभिरश्विना॒ सौभ॑गेभिः।तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वीऽउ॒त द्यौः॥३०॥

द्युभि॒रिति॒ द्युऽभिः॑। अ॒क्तुभि॒रित्य॒क्तुऽभिः॑। परि॑। पा॒त॒म्। अ॒स्मान्। अरि॑ष्टेभिः। अ॒श्वि॒ना॒। सौभ॑गेभिः ॥ तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। मा॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः ॥३० ॥

Mantra without Swara
द्युभिरक्तुभिः परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्विना सौभगेभिः । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवीऽउत द्यौः ॥

द्युभिरिति द्युऽभिः। अक्तुभिरित्यक्तुऽभिः। परि। पातम्। अस्मान्। अरिष्टेभिः। अश्विना। सौभगेभिः॥ तत्। नः। मित्रः। वरुणः। मामहन्ताम्। अदितिः। सिन्धुः। पृथिवी। उत। द्यौः॥३०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( अश्विना ) व्यापक अधिकार और सामर्थ्य वाले सभाध्यक्ष और सेनाध्यक्ष, तुम दोनों ( युभिः अक्तुभिः ) दिनों और रात्रियों में (अरिष्टेभिः) अविनष्ट, एवं मंगलकारक, सुखप्रद, हितकारी (सौभगेभिः ) सौभाग्यों, धन सम्पदाओं से ( अस्मान् परिपातम् ) हम प्रजाजनों की रक्षा करो। (तत्) तब (मित्र: वरुणः) मित्र स्नेही और वरुण, दुष्टवारक, सर्वश्रेष्ठ न्यायाधीश और दण्डाध्यक्ष दोनों (नः) हमारे पालन के कार्यं को ( मामहन्ताम् ) और अधिक उत्तम एवं कीर्ति योग्य बनावें । (अदिति:) अखण्ड राज्यशासन करने वाली राजसभा और (सिन्धुः ) राज्यप्रबन्ध द्वारा देशों और प्रजाओं को परस्पर बांधने वाला, समुद्र के समान गम्भीर राजा ( पृथिवी उत द्यौः) पृथिवी के समान विस्तृत और सूर्य के समान तेजस्वी दोनों (मामहन्ताम् ) राजा के रक्षण कार्य को उन्नत करें।
Subject
विद्वानों और नायक राजा के कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
कुत्स ऋषि: । अश्विनौ देवते । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥