Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 28

58 Mantra
34/28
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒भा पि॑बतमश्विनो॒भा नः॒ शर्म॑ यच्छतम्।अ॒वि॒द्रि॒याभि॑रू॒तिभिः॑॥२८॥

उ॒भा। पि॒ब॒त॒म्। अ॒श्वि॒ना॒। उ॒भा। नः॒। शर्म॑। य॒च्छ॒त॒म् ॥ अ॒वि॒द्रि॒याभिः॑। ऊ॒तिभि॒रित्यू॒तिऽभिः॑ ॥२८ ॥

Mantra without Swara
उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम् । अविद्रियाभिरूतिभिः ॥

उभा। पिबतम्। अश्विना। उभा। नः। शर्म। यच्छतम्॥ अविद्रियाभिः। ऊतिभिरित्यूतिऽभिः॥२८॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(उभा) दोनों (अश्विना) विद्या और अधिकारों में व्याप्त अध्यापक, सभाध्यक्ष और सेनाध्यक्ष दोनों मुख्य अधिकारी ( पिबतम् ) राष्ट्रैश्वर्यं का उत्तम रस के समान पानवत्, पालन करें और (उभा) दोनों (नः) हमें (शर्मं) सुख, शरण (अविद्वियाभिः) अखण्डित, कभी नष्ट न होने वाले दृढ़, त्रुटि रहित, छल छिद्र रहित एवं आनन्दित, उत्तम ( ऊतिभिः ) रक्षा साधनों से ( शर्म ) सुख एवं शरण, उत्तम गृह आदि साधन ( यच्छतम् ) प्रदान करें । 'अविद्वियाभि: ' - ' विदारणे' इत्य- स्मादौणादिकः इयक मही० । घजर्थे कस्ततो घस्तद्धित इति दया० । द्रा कुत्सायां गतौ इत्यस्मादौणादिकः किः । अविद्विर्निन्दा, तद्विरोधनीं स्तुतिं यान्तीति अविद्वियाः, ताभिरिति सायणः ।
Subject
विद्वानों और नायक राजा के कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रस्कण्व ऋषिः । अश्विनौ देवते । निचृद् गायत्री । षड्जः ॥