Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 23

58 Mantra
34/23
Devata- सोमो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वेन॑ नो॒ मन॑सा देव सोम रा॒यो भा॒गꣳ स॑हसावन्न॒भि यु॑ध्य।मा त्वा त॑न॒दीशि॑षे वी॒र्य्यस्यो॒भये॑भ्यः॒ प्र चि॑कित्सा॒ गवि॑ष्टौ॥२३॥

दे॒वेन॑। नः॒। मन॑सा। दे॒व॒। सो॒म॒। रा॒यः। भा॒गम्। स॒ह॒सा॒व॒न्निति॑ सहसाऽवन्। अ॒भि। यु॒ध्य॒ ॥ मा। त्वा॒। आ। त॒न॒त्। ईशि॑षे। वी॒र्य्य᳖स्य। उ॒भये॑भ्यः। प्र। चि॒कि॒त्स॒। गवि॑ष्टा॒विति॒ गोऽइ॑ष्टौ ॥२३ ॥

Mantra without Swara
देवेन नो मनसा देव सोम रायो भागँ सहसावन्नभियुध्य । मा त्वा तनदीशिषे वीर्यस्योभयेभ्यः प्र चिकित्सा गविष्टौ ॥

देवेन। नः। मनसा। देव। सोम। रायः। भागम्। सहसावन्निति सहसाऽवन्। अभि। युध्य॥ मा। त्वा। आ। तनत्। ईशिषे। वीर्य्यस्य। उभयेभ्यः। प्र। चिकित्स। गविष्टाविति गोऽइष्टौ॥२३॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (सहसावन्) बलपूर्वक शत्रु पर विजय लाभ करने हारे ! हे (देव) राजन् ! प्रजाओं के सुखदाता एवं शत्रु पर विजय करने के इच्छुक ! तू (देवेन मनसा ) विजय की कामना वाले मन से (नः) हमारे ( राय: भागम् ) ऐश्वर्य को ले लेने वाले शत्रु को (अभियुध्य) युद्ध में परास्त कर । तू (उपयेभ्यः) शत्रु और मित्र दोनों पक्षों के लोगों के (वीर्यस्य) बलों पर (ईशिषे) स्वामित्व करने में समर्थ है। शत्रु (त्वा मा तनत् ) तुझे न व्याप ले, तुझे न दबा ले ! तू (गविष्टौ ) बाणों के निरन्तर प्रहारों के स्थान संग्राम में ( प्र चिकित्स) शत्रुओं को रोगों के समान दूर करने का यत्न कर, अथवा ( प्र चिकित्स) युद्ध से प्राप्त क्षत आदि की उत्तम चिकित्सा का प्रबन्ध कर । अथवा - (रायः भागं नः अभियुध्य) - ऐश्वर्य का भाग हमें प्राप्त करा । (गविष्टौ उभयेभ्यः प्र चिकित्स) सुख के निमित्त, हमारे ऐहिक, पारमार्थिक सुखों के बीच में आये विघ्न निवारण कर । ( मही०, दया०, उवट )
Subject
विद्वानों और नायक राजा के कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
गोतमः । सोमः। निचृत् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥