Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 15

58 Mantra
34/15
Devata- अग्निर्देवता Rishi- देवश्रवदेववातौ भारतावृषी Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इडा॑यास्त्वा प॒दे व॒यं नाभा॑ पृथि॒व्याऽअधि॑।जात॑वेदो॒ नि धी॑म॒ह्यग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोढ॑वे॥१५॥

इडा॑याः। त्वा॒। प॒दे। व॒यम्। नाभा॑। पृ॒थि॒व्याः। अधि॑ ॥ जात॑वेद॒ इति॑ जात॑ऽवेदः। नि। धी॒म॒हि॒। अग्ने॑। ह॒व्याय॑। वोढ॑वे ॥१५ ॥

Mantra without Swara
इडायास्त्वा पदे वयन्नाभा पृथिव्याऽअधि । जातवेदो नि धीमह्यग्ने हव्याय वोढवे ॥

इडायाः। त्वा। पदे। वयम्। नाभा। पृथिव्याः। अधि॥ जातवेद इति जातऽवेदः। नि। धीमहि। अग्ने। हव्याय। वोढवे॥१५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( जातवेदः ) ऐश्वर्यवन्! हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्विन्, अग्रणी सेनानायक, (त्वा) तुझको ( वयम् ) हम ( पृथिव्याः नाभा अधि) पृथिवी के केन्द्र में और ( इडायाः पदे अधि) स्तुति योग्य प्रजा के प्रतिष्टित पद पर अथवा वाणी या आज्ञा प्रदान करने के आज्ञापक पद पर (हव्याय) स्तुति योग्य राजपद के ( वोढवे ) धारण करने के लिये (निधीमहि ) स्थापित करते हैं ।
(२) आचार्य पक्ष में- हे विद्वन् ! तुझको हम पृथिवी के बीच, उत्तम वाणी के प्रतिष्ठित आचार्य पद पर प्रदान योग्य ज्ञान दान के लिये स्थापित करें ।
Subject
पृथ्वी के केन्द्र में राजा की स्थिति ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
देवश्रवोदेववातौ भारतावृषी । अग्निदेवता ।विराडनुष्टुप् । गान्धारः ॥