Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 74

97 Mantra
33/74
Devata- सूर्यो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ति॒र॒श्चीनो॒ वित॑तो र॒श्मिरे॑षाम॒धः स्वि॑दा॒सी३दु॒परि॑ स्विदासी३त्।रे॒तो॒धाऽआ॑सन् महि॒मान॑ऽआसन्त्स्व॒धाऽअ॒वस्ता॒त् प्रय॑तिः प॒रस्ता॑त्॥७४॥

ति॒र॒श्चीनः॑। वित॑त॒ऽइति॒ विऽत॑तः। र॒श्मिः। ए॒षा॒म्। अ॒धः। स्वि॒त्। आ॒सीत्। उ॒परि॑। स्वि॒त्। आ॒सी॒त् ॥ रे॒तो॒धा इति॑ रेतः॒ऽधाः। आ॒स॒न्। म॒हि॒मानः॑। आ॒स॒न्। स्व॒धा। अ॒वस्ता॑त्। प्रय॑ति॒रिति॒ प्रऽय॑तिः। प॒रस्ता॑त् ॥७४ ॥

Mantra without Swara
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त् । रेतोधाऽआसन्महिमानऽआसन्त्स्वधाऽअवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥

तिरश्चीनः। विततऽइति विऽततः। रश्मिः। एषाम्। अधः। स्वित्। आसीत्। उपरि। स्वित्। आसीत्॥ रेतोधा इति रेतःऽधाः। आसन्। महिमानः। आसन्। स्वधा। अवस्तात्। प्रयतिरिति प्रऽयतिः। परस्तात्॥७४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
राष्ट्रपक्ष में- ( एषाम् ) इन अपने स्थानों पर आदरपूर्वक अभिषेक को प्राप्त हुए विद्वान् अधिकारी पुरुषों का शासनाधिकार या तेज (रश्मिः) तेजस्वी सूर्य आदि पदार्थों की किरणों के समान (तिरश्चीनः ) बहुत दूर तक जाने वाला, प्रकाश की किरण के समान तिरछा, अपनी सीध में जाने वाला और ( विततः) विविध प्रकारों से फैलता है । (अधः स्वित् आसीत् ) वह नीचे भी रहता है और ( उपरस्वित् ) और ऊपर भी रहता है । वे सभी राष्ट्र के भीतर ( रेतो-धाः आसन् ) शरीर में वीर्य को धारण करने वाले अंगों के समान स्वयं वीर्यवान् बलवान् एवं ब्रह्मचारी हों और वे (महिमानः) महान् सामर्थ्य वाले हों । उनकी (स्वधा ) अपने शरीर धारण निमित्त प्राप्त अन्न, वेतन आदि पदार्थ ( अवस्तात् ) नीचे अर्थात् तुच्छ हैं परन्तु उनका (प्रयतिः) राष्ट्र की व्यवस्था का उत्तम यत्न और नियम का कार्य (परस्तात्) परम उच्च, उत्कृष्ट हो । (२) अधिदैवत पक्ष में- इन सूर्यादि लोकों का प्रकाश तिरछा, सर्वत्र दूर दूर तक फैलता है । क्या नीचे, क्या ऊपर, क्या पास, क्या दूर ? सभी स्थान पर है । ये सभी ज्योतिर्मय सूर्य आदि पदार्थ, जीव सृष्टि के उत्पन्न करने वाले बीजों को धारण करते हैं और बड़े सामर्थ्य वाले । (स्वधा) स्वयं संसार को धारण करने वाली प्रकृति, शरीर को धारण करने वाले जीव भोग्य पदार्थ अन्न आदि के समान (अवस्तात् ) पर भोग्य और अधीन रहने से नीची श्रेणी के हैं और (प्रयतिः) उनको प्रेरणा देने वाला, चलाने वाला परम प्रयत्न- -स्वरूप परमेश्वर ( परस्तात् ) बहुत ऊंचा, उनसे कहीं महान् है । (३) अध्यात्म में - ( एषाम् रश्मिः ) प्रकृति, प्रजापति का संकल्प और सृष्टि प्रेरक बल इन तीनों का ( रश्मिः) नियामक बल (तिरश्चीनः) मध्य में, (अधस्तात्, उपरिस्वित् ) ऊपर और नीचे सर्वत्र व्यापक है । सृष्टि-रचना के अवसर में (रेतोधाः आसन्) बीजरूप से कर्मों को संस्कार रूप में धारण करने वाले कर्त्ता और भोक्ता जीव भी विद्यमान थे और ( महिमानः आसन् ) पृथिवी आदि पांच महाभूत भोग्यरूप भी थे, परन्तु उनमें भी ( स्वधा अवस्तात् ) अन्न के समान भोग, पदार्थ निकृष्ट था और (प्रयतिः परस्तात्) प्रयत्नशील आत्मा उत्कृष्ट था ( सायण, मही०)(४) अथवा - परमेश्वर के उत्पादक और नियामक बल का वर्णन है- (एषां लोकानां मध्ये रश्मिः) इन समस्त लोकों के बीच में सबका प्रकाशक रश्मि और सर्वनियन्ता ( तिरश्चीनः ) सब दूर ( अधः स्विद् उपरिस्वित् ) ऊपर और नीचे, सर्वत्र व्याप्त है । ये समस्त लोक और महत् आदि प्रकृति विकार गण (रेतोधा:) सृष्टि के उत्पादक ब्रह्म बीज को धारण करने वाले और उसी के (महिमानः) समान सामर्थ्य को धारण करने हारे हैं । परमात्मा (स्वधा ) स्व- रूप को धारण करने वाली परम शक्ति ही ( अवस्तात् ) उरे, छोटे से छोटे पदार्थ में भी है और उसका लोक-सञ्चालक (प्रयतिः) महान् प्रयत्न ( परस्तात् ) दूर से दूर लोक में भी विद्यमान है ।
Footenote
अयवेनश्चोदयात् । इति काण्वः ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिर्ऋषिः । सूर्यो भाववृत्तो देवता । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥