Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 71

97 Mantra
33/71
Devata- मित्रावरुणौ देवते Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गाव॒ऽउपा॑वताव॒तं म॒ही य॒ज्ञस्य॑ र॒प्सुदा॑।उ॒भा कर्णा॑ हिर॒ण्यया॑॥७१॥

गावः। उप॑। अ॒वत॒। अ॒वतम्। म॒हीऽइति॑ म॒ही। य॒ज्ञस्य॑। र॒प्सुदा॑ ॥ उभा। कर्णा॑। हि॒र॒ण्यया॑ ॥७१ ॥

Mantra without Swara
गावऽउपावतावतम्मही यज्ञस्य रप्सुदा । उभा कर्णा हिरण्यया ॥

गावः। उप। अवत। अवतम्। महीऽइति मही। यज्ञस्य। रप्सुदा॥ उभा। कर्णा। हिरण्यया॥७१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
इस ऋचा की व्याख्या देखो अ० ३३ । १९ ॥ तथापि, हे (गाव:) सूर्य की रश्मियों के समान तेजस्वी पुरुषो ! आप लोग (उप भवत) हमारी रक्षा करो और (यज्ञस्य) यज्ञ, सबको एकत्र मिलाये रहने रखने वाले, राष्ट्रीयज्ञ के (रप्सुदा) उत्तम रूप प्रदान करने वाले, सूर्य पृथिवी के समान राजा और प्रजाजन (मही) दोनों पूज्य हैं और (उभा) दोनों ही (हिरण्यया) एक दूसरे के प्रति हितकर और रमणीय ज्ञानवान् और सम्पन्न कार्य करने में पतिपत्नी के समान, (कर्णा) एक ही राष्ट्र के कार्य करने हारे होकर ( अवतम् ) एक दूसरे की रक्षा करो। अथवा- जिस प्रकार गौवें अपने ( अवतम् ) रक्षक गोपति के पास आती हैं उसी प्रकार विद्वान् भी अपने रक्षक को प्राप्त करे उसकी रक्षा करे ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वसिष्ठः । मित्रावरुणौ । गायत्री । षड्जः ॥