Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 69

97 Mantra
33/69
Devata- सविता देवता Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अद॑ब्धेभिः सवितः पा॒युभि॒ष्ट्वꣳ शि॒वेभि॑र॒द्य परि॑ पाहि नो॒ गय॑म्।हिर॑ण्यजिह्वः सुवि॒ताय॒ नव्य॑से॒ रक्षा॒ माकि॑र्नोऽअ॒घश॑ꣳसऽ ईशत॥६९॥

अद॑ब्धेभिः। स॒वित॒रिति॑ सवितः। पा॒युभि॒रिति॑ पा॒युभिः॑। त्वम्। शि॒वेभिः॑। अ॒द्य। परि॑। पा॒हि॒। नः॒। गयम् ॥ हिर॑ण्यजिह्व इति॒ हिर॑ण्यऽजिह्वः। सु॒विताय॑। नव्य॑से। र॒क्ष॒। माकिः॑ नः॒। अ॒घशं॑सः। ई॒श॒त॒ ॥६९ ॥

Mantra without Swara
अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्ट्वँ शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम् । हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्ना अघशँस ईशत ॥

अदब्धेभिः। सवितरिति सवितः। पायुभिरिति पायुभिः। त्वम्। शिवेभिः। अद्य। परि। पाहि। नः। गयम्॥ हिरण्यजिह्व इति हिरण्यऽजिह्वः। सुविताय। नव्यसे। रक्ष। माकिः नः। अघशंसः। ईशत॥६९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
सूर्य जिस प्रकार (अदब्धेभिः) नष्ट न होने वाली, सुखकारी (पायुभिः) पवित्रकारी, पालन में समर्थ किरणों से हम ( गयम् ) गृह प्राण और देह की रक्षा करता है और जिस प्रकार अग्नि (हिरण्यजिह्वः नव्य से) सुवर्ण के समान दीप्ति वाली जिह्वा, ज्वाला से सदा नये-नये सुख प्रदान करता है । हे ( सवितः ) सबके प्रेरक, उत्तम कर्मों और राज्य प्रबन्धों के उत्पादक, विद्वन् ! राजन् ! तू (अदब्धेभिः) अखण्डित, स्थिर, जिनको कोई भंग न कर सके ऐसे (शिवेभिः) कल्याणकारी (पायुभिः) रक्षण पालन करने के उपायों से (अद्य) आज और सदा (न: गयम् ) हमारे गृह, पुत्र, कलत्रादि की भी (परिपाहि ) रक्षा कर । तू (हिरण्य-ह्वः) हित और हृदय को उत्तम लगने वाली वाणी से युक्त, अथवा हिरण्य के समान सदा उज्वल, खरी, सत्य वाणी बोलने हारा होकर ( नव्य से) सदा नये, मनोहर (सुविताय ) उत्तम ऐश्वर्य और ज्ञान प्राप्त करने के लिये ( रक्ष ) हमारी रक्षा कर । ( नः ) हम पर ( अघशंसः ) पापकर्म की बात कहने वाला ( माकि: ईशत ) कोई शासन न करे । " हिरण्यजिह्नः ' - हिरण्यं हितरमणं भवतीति वा, हृदयरमणं भवतीति वा । निरु० २ । १० ॥ जिह्वेति वाङ्नाम । निघ० १ । ११ ॥ हिरण्यवद् अविचला जिह्वा यस्य । सत्यावाक् । यद्वा हिरण्या हिता रमणीया च जिह्वा ज्वाला वाणी वा यस्येति । म०, द० सत्यावाक् । उ० ।
Subject
बड़े राजा और परमेश्वर की स्तुति । अन्य अधिकारियों के कर्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
भरद्वाज ऋषिः । सविता देवता । निचृत् जगती । निषादः ॥