Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 5

97 Mantra
33/5
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्वे विरू॑पे चरतः॒ स्वर्थे॑ऽअ॒न्यान्या॑ व॒त्समुप॑ धापयेते।हरि॑र॒न्यस्यां॒ भव॑ति स्व॒धावा॑ञ्छु॒क्रोऽअ॒न्यस्यां॑ दद्य्शे सु॒वर्चाः॑॥५॥

द्वेऽइति॑ द्वे। विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे। च॒र॒तः॒। स्वर्थे॒ इति॑ सु॒ऽअर्थे॑। अ॒न्यान्येत्यन्याऽअ॑न्या। व॒त्सम्। उप॑। धा॒प॒ये॒ते॒ऽइति॑ धापयेते ॥ हरिः॑। अ॒न्यस्या॑म्। भव॑ति। स्व॒धावा॒निति॑ स्व॒धाऽवा॑न्। शु॒क्रः। अ॒न्यस्या॑म्। द॒दृ॒शे॒। सु॒वर्चा॒ इति॑ सु॒ऽवर्चाः॑ ॥५ ॥

Mantra without Swara
द्वे विरूपे चरतः स्वर्थेऽअन्यान्या वत्समुप धापयेते । हरिरन्यस्याम्भवति स्वधावाञ्छुक्रोऽअन्यस्यान्ददृशे सुवर्चाः ॥

द्वेऽइति द्वे। विरूपे इति विऽरूपे। चरतः। स्वर्थे इति सुऽअर्थे। अन्यान्येत्यन्याऽअन्या। वत्सम्। उप। धापयेतेऽइति धापयेते॥ हरिः। अन्यस्याम्। भवति। स्वधावानिति स्वधाऽवान्। शुक्रः। अन्यस्याम्। ददृशे। सुवर्चा इति सुऽवर्चाः॥५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
जैसे (द्वे ) दो ( विरूपे ) भिन्न-भिन्न रूप रंग वाली स्त्रियां (सु- अर्थे) शुभ प्रयोजन में लगी हुई (चरतः) भिन्न-भिन्न प्रकार का आचरण और आहार विहार करती हैं और (अन्या - अन्या) वे दोनों पृथक्,
(अन्या-अन्या) पृथक् या एक दूसरे के (वत्सम् ) बालक को (उपधापयेते) दूध पिलाती हैं । ( अन्यस्याम् ) एक नैं से तो ( हरिः ) श्याम वर्ण का, मनोहर ( स्वधावान् ) उत्तम, शान्ति आदि गुणों वाला पुत्र (भवति) हो और ( अन्यस्याम् ) दूसरी में से (शुक्रः) शुचिकर, शुद्ध, (सुवर्चाः) उत्तम, तेजस्वी पुत्र ( ददृशे ) प्रकट हुआ दिखाई दे इसी प्रकार रात्रि और दिन (द्वे विरूपे चरतः ) दोनों प्रकाश और अन्धकार के कारण भिन्न-भिन्न रूप होकर विचरते हैं । दोनों (अन्या-अन्या वत्सम् उपधापयेते) पृथक्-पृथक् एक दूसरे के बालक के समान चन्द्र और सूर्य को पोषित करते हैं । अथवा वे दोनों एक दूसरे से मिल कर ( वत्सम् ) बसे हुए संसार को पालते पोसते हैं। एक में (हरिः) ताप आदि हरने से हरि, मनोहर, ( स्वधावान् ) अन्नादि ओषधि के पोषक रसों एवं जल, ओस आदि से युक्त चन्द्र उत्पन्न होता है और (अन्यस्याम्) दूसरी, दिन वेला में (शुक्रः) कान्तिमान् (सुवर्चाः) उत्तम तेजस्वी सूर्य ( दहशे ) दिखाई देता है । अथवा - दिन वेला रात्रि से उत्पन्न हुए सूर्य को अधिक तेजस्वी करती है और रात्रि वेला दिन के अन्तिम प्रहर में उत्पन्न अग्नि को अधिक उज्ज्वल कर देती है । जलादि रस के शोषण करने से सूर्य 'हरि' है और कान्तिमान् होने से अग्नि 'शुक्र' है ।
Subject
विद्वान् मित्रों और श्रेष्ठों का आदर करने का उपदेश । सूर्य चन्द्र या अग्नि सूर्य के समान दो शक्तियों का संसारपालन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
कुत्मः । अग्निः । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥