Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 41

97 Mantra
33/41
Devata- सूर्यो देवता Rishi- नृमेध ऋषिः Chhand- निचृद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
श्राय॑न्तऽइव॒ सूर्य्यं॒ विश्वेदिन्द्र॑स्य भक्षत।वसू॑नि जा॒ते जन॑मान॒ऽओज॑सा॒ प्रति॑ भा॒गं न दी॑धिम॥४१॥

श्राय॑न्तऽइ॒वेति॒ श्राय॑न्तःऽइव। सूर्य॑म्। विश्वा॑। इत्। इन्द्र॑स्य। भ॒क्ष॒त॒ ॥ वसू॒नि। जा॒ते। जन॑माने। ओज॑सा। प्रति॑। भा॒गम्। न। दी॒धि॒म॒ ॥४१ ॥

Mantra without Swara
श्रायन्तऽइव सूर्यँविश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जाते जनमानऽओजसा प्रति भागन्न दीधिम ॥

श्रायन्तऽइवेति श्रायन्तःऽइव। सूर्यम्। विश्वा। इत्। इन्द्रस्य। भक्षत॥ वसूनि। जाते। जनमाने। ओजसा। प्रति। भागम्। न। दीधिम॥४१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग ( सूर्यम् ) सबके प्रेरक सर्वोत्पादक परमेश्वर का ( श्रायन्त इव) श्राश्रय लेते हुए ही (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवान् आत्मा के (विश्वा वसूनि ) समस्त देह में बसने से प्राप्त करने योग्य आनन्दों का (भक्षत) भोग करो। हम लोग (जाते) उत्पन्न हुए और ( जनमाने) आगे उत्पन्न होने वाले संसार में (भागं न ) अपने कमाये धन को प्रदान करते हैं, उसी प्रकार (ओजसा) बल पराक्रम से कमाये हुए ( भागम् ) सेवन करने योग्य कर्म-फल को अब तक उत्पन्न और आगे उत्पन्न होने वाले जन्म या देह में (दीधिम) धारण करते हैं ।
(२) सूर्य के समान तेजस्वी राजा का आश्रय लेकर ही हम ऐश्वर्यवान् राष्ट्र के धनों का भोग करें और उत्पन्न और आगे होने वाले प्रजा आदिक में अपने पराक्रम से कमाये धन प्रदान करें ।
Subject
परमेश्वर के आश्रय पर कमाये धन के समान कर्मफल का भोग ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
नृमेधः सूर्यः । निचृद् बृहती । मध्यमः ॥