Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 32

97 Mantra
33/32
Devata- सूर्यो देवता Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
येना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒णयन्तं॒ जनाँ॒२ऽअनु॑।त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि॥३२॥

येन॑। पा॒व॒क॒। चक्ष॑सा। भु॒र॒ण्यन्त॑म्। जना॑न्। अनु॑ ॥ त्वम्। व॒रु॒॒ण॒। पश्य॑सि ॥३२ ॥

Mantra without Swara
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तञ्जनाँऽअनु । त्वँवरुण पश्यसि ॥

येन। पावक। चक्षसा। भुरण्यन्तम्। जनान्। अनु॥ त्वम्। वरुण। पश्यसि॥३२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (वरुण) पापों के निवारक ! सर्वश्रेष्ठ, परमेश्वर ! राजन् ! हे (पावक) सूर्य और अग्नि के समान पवित्र कारक, जनों को दण्ड आदि से निष्पापकारक ! (येन) जिस (चक्षसा ) दर्शन या प्रकाश से (भुरण्यताम् ) सबके पालक पुरुष को (पश्यति) देखता है उसी से ( त्वम् ) तू अन्य मनुष्यों को भी ( अनु पश्यसि ) देख, उनको ज्ञान दे और मार्ग दिखा । राजा छोटे बड़े सबको एक समान देखे, एक समान शासन करे समान रूप से शिक्षित करे ।
Subject
मुख्य पदाधिकारियों का राष्ट्र को समृद्धिमान् बनाना ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रस्कण्वः । सूर्यः । निचृद् गायत्री । षड्जः ॥